
Anshu Kumari
हमारे मन में हमारे शरीर को लेकर ऐसा डर बैठा दिया गया है कि जब हम अकेले कही जाते है तो डर सा लगने लगता है कि कही कुछ गलत न हो जाए l कुल मिलाकर हमारे शरीर को एक मुद्दा बनाकर घर में कैद या किसी पुरुष के अधीन कर दिया जाता है l💯🍂
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हमारे मन में हमारे शरीर को लेकर ऐसा डर बैठा दिया गया है कि जब हम अकेले कही जाते है तो डर सा लगने लगता है कि कही कुछ गलत न हो जाए l कुल मिलाकर हमारे शरीर को एक मुद्दा बनाकर घर में कैद या किसी पुरुष के अधीन कर दिया जाता है l💯🍂

अंशु जी, डर की बात सही है, पर देखिए कि डर वास्तव में किसको बचाने के लिए खड़ा किया गया है। शरीर को ख़तरा बताकर असल में रोका किसको जा रहा है - शरीर को, या उस स्त्री के अपने निर्णय लेने के हक़ को? अगर मकसद सुरक्षा ही होता तो वह सहायता और समझ के रूप में आता, कैद और अधीनता के रूप में नहीं। तो अगली बार जब यह डर दिखे, अपने से पूछिए कि यह डर किसकी स्वतंत्रता को बचा रहा है - मेरी, या किसी और की सुविधा को। यही फ़र्क़ असली बाधा को दिखाता है।