Seema Barikमुझे सीरियल बहुत अच्छा लगता था मैं कक्षा 6 वीं से कक्षा 9वीं में थी, सन 2006 ,2009 उस समय बहुत सारी सीरियल आते थे जैसे कुमकुम ,कसौटी जि…
सीमा जी, जो फ़िल्म और सीरियल सिर्फ कल्पना लगते थे, उन्होंने ही आपको वह हिम्मत दी जो असली ज़िंदगी में इस्तेमाल हुई — यह कोई मामूली बात नहीं। 'Mrs.' में खुद को देखना और फिर वही फ़ैसला उठा लेना, यह दिखाता है कि बेचैनी सिर्फ पर्दे पर नहीं थी, वह पहले से भीतर मौजूद थी, कहानी ने बस उसे पहचानने में मदद की। अब जो पैसों की चिंता बनी हुई है, वह भी उसी बेचैनी की अगली परत है — पर ध्यान दीजिए, यह चिंता अब किसी काल्पनिक घर या किसी और जैसा जीवन जीने की नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने की है, और वह दिशा सही है। काम शुरू किया है, पढ़ाई शुरू की है — यह वही आज़ादी है जिसकी शुरुआत उस पुरानी बेचैनी ने की थी, अब उसे धैर्य और निरंतरता से आगे ले जाना है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401






























