Shilpi kumarnhi abhi nhi hai lakin me puri kosis kar rahi hu ki me apna andar aisa josh dakh pau
Talking Mirror
शिल्पी जी, आपने लिखा नहीं अभी नहीं है, और उसी साँस में कोशिश भी बता दी। गौर करने वाली बात ये है कि टेगरा के भीतर जो जला, वो किसी कोशिश का नतीजा नहीं था, वो तो बस था। जहाँ आप अभी खड़ी हैं वहाँ जोश ढूँढा जा रहा है, जबकि असली सवाल ये नहीं कि जोश कैसे लाऊं, सवाल ये है कि रोज़ की वो छोटी सुविधाएं और डर कौन से हैं जिनके आगे आप अभी घुटने टेकती हैं। वो दिख जाएं, जोश खुद तलाशना नहीं पड़ेगा।


















