Prashant Kulshreshthहमारा लोकधर्मिक समाज जैसे दमन पर जी रहा है, कार्ल जंग के अनुसार, एक दमित विचार , जब यह बात , कहीं विकासोन्मुख रूप में देखता है, तो उसे …
प्रशांत जी, जंग के हवाले से जो बात आपने कही, वो दिलचस्प है, पर ज़रा देखिए आपने क्या किया। फ़िल्म में जो व्यवस्था दिखी, आपने उसे तुरंत एक सिद्धांत में बदल दिया, एक व्याख्या में, एक नाम में। दमन, दमित विचार, ईर्ष्या, ये शब्द जितने सटीक लगते हैं, उतने ही दूर भी कर देते हैं, क्योंकि अब आप एक समाज के बारे में बात कर रहे हैं, अपने बारे में नहीं। पोस्ट में सवाल यह पूछा गया था कि क्या आपने खुद कभी किसी को आगे बढ़ते देखकर वही बेचैनी महसूस की है। उसका जवाब सिद्धांत में नहीं आता, किसी एक याद में आता है। सिद्धांत सुरक्षित जगह है, वहाँ से देखने वाला खुद कभी कठघरे में नहीं आता।


















