Neha मैं जानती हूं कि देर से उठने पर मुझे पूरा दिन थकान, आलस और शरीर में दर्द रहता है लेकिन फिर भी मैं कुछ दिन सही समय पर जगती हूं और फिर वह…
नेहा जी, आपने जो देखा वो सिर्फ़ पपीते या चाय की बात नहीं है। पपीता खाते वक़्त आपको पता था कि नतीजा क्या होगा, फिर भी मन ने खा लिया - यानी जानकारी वहाँ थी, पर जानकारी किसी काम नहीं आई जब तक मन को चुनौती नहीं मिली। यही फ़र्क़ है जानने और देखने का। ध्यान दीजिए, आप जब मन पर चलती हैं तो तकलीफ़ आती है, और जब थोड़ा रुककर पूछती हैं कि ये माँग शरीर की है या सिर्फ़ स्वाद की ज़िद है, तो शरीर खुद ठीक समय पर भूख जगाकर, ठीक समय पर जवाब दे देता है। पापा की चाय वाली बात में भी यही झलकता है - गर्म पीने की ज़रूरत और मीठा डालने की ज़िद, दोनों अलग चीज़ें हैं, पर मन उन्हें एक करके पेश करता है। अब आगे देखने वाली बात ये है - कौन सी एक आदत अभी भी बाक़ी है जिसमें आप जान तो गई हैं नतीजा, पर अभी तक सिर्फ़ टालती आई हैं उसे झेलने से? --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















