
मैं जहाँ रहती हूँ वहाँ पूरे गाँव की एक मान्यता है। मेरे गाँव में एक पुलिया है, तो पूरे गाँव की मान्यता है कि इस पुलिया से एक तरफ जितने भी पंडित रहेंगे मतलब जो जाति से पंडित हैं उनके साथ कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता मतलब उनका सब कुछ खतम हो जायगा और क्योंकि ऐसा हो भी चुका है कई पंडितों के साथ, पर ऐसा नहीं है कि केवल उनके साथ ही होता है, और लोगों के साथ भी होता है लेकिन मान्यता उन्हीं के प्रति बनाये रखें हैं कि अगर वो लोग रहेंगे तो उनका सब कुछ छिन जायगा। पर ये सभी लोग ये नहीं जानते कि असली छिनना क्या होता है सभी लोग बस बाहरी चीजों के छिनने की बात कर रहे कि कारोबार नही चलेगा, शादी नही होगी, कोई मर जायगा etc असली चीज क्या है जो सभी लोग गवाये बैठें हैं वो किसी को नहीं पता। और ना ही वो जानना चाहते हैं। और दूसरा कि हम किसी घटना को वो जैसी है उसको वैसा ही क्यों नहीं देख पाते ? क्यों लोग उसमें खुद को मौजूद रखना चाहते हैं ? क्योंकि लोग इसी से अपने होने का प्रमाण देते हैं कि मैं हूँ, नहीं तो जो प्रकृति का नियम चल रहा है वो अपने नियमों के अनुसार चलता रहेगा उसमें किसी को बोलने की जरूरत नही है लेकिन फिर भी लोग अपना मत देते हैं ताकि वो बता सकें कि देखो मैं भी कुछ हूँ और जब ऐसा होता है तब साधारण बात भी असाधारण हो जाती है। क्योंकि जैसी बात है अगर वैसी ही अपना ली तो (मैं )का तो अस्तित्व ही मिट जायगा न।



















