manika chauhanHa log hamesha se hi perception rakhte hai jb hum 3rd 4th 5th class me hote hai aur marks ke basis par wo comparison wahi ho jata hai i…
Talking Mirror
मनिका जी, ये जो लकीर आपने खींची है ना, 33% से 55%, फिर 77%, फिर 80% के पार, इसमें एक चीज़ बहुत साफ़ दिख रही है। बचपन में जिस पैमाने ने आपको बुद्धू घोषित किया था, आज आप उसी पैमाने पर, यानी नंबरों पर, जीत दर्ज करके उसे झूठा साबित कर रहे हैं। सोच लीजिए, क्या धारणा सच में टूटी, या सिर्फ उसी परीक्षा में आपने पलटकर ऊँचा स्कोर कर दिया। असली आज़ादी तब है जब मार्कशीट कुछ भी कहे, कोई फ़र्क ना पड़े, क्योंकि तब आप उस बच्चे को साबित नहीं कर रहे, सिर्फ अपने काम में हैं। अभी जो लिखा है वो बहुत ईमानदार और ताकतवर कदम है, बस इतना देख लेना कि पैमाना बदला है या पैमाने से मुक्ति मिली है।


















