
इस बार जन्माष्टमी में गोवा में आयोजित गीता सत्र में प्रतिभाग करना बड़ा ही अनोखा अनुभव रहा। गीता प्रतिभागी मित्रों से मिलकर अनुभव साझा कर, प्रकृति के नज़ारे, गोवा में स्कूटी-राइड करना, इन सब ने नई ऊर्जा से भर दिया। हमने पहले भी कृष्ण जन्माष्टमी मनायी है, लेकिन उसमें बाहरी दिखावा, पाक-पकवान, व्यंजन, भोजन, व्यर्थ आडंबर और झाँकियों के नाम पर कुछ भी अनर्गल चीजें देखने को मिलती थीं। इन सब बातों में कहीं भी वास्तव में कृष्ण कहाँ हैं? कभी सोचा नहीं, बस अंधानुकरण करते रहे। आचार्य जी ने ही ये सिखाया कि कृष्ण निर्वैयक्तिक सिद्धांत हैं, वह गीता का ज्ञान हैं, वो सारथी हैं सत्य की राह की ओर बढ़ने के लिए। और कृष्ण जीवन में हों तो हर दिन उत्सव ही होता है, कोई एक दिन ही याद करके इतिश्री क्यों किया जाय। गोवा का नाम सुनके जो ख्याल आता है, वो मौज-मस्ती और सैर-सपाटे का ही आता था, लेकिन लोक प्रचलित प्रथाओं और रीतियों से हटकर इस तरह गीता सत्र से सीखना, ज़्यादा प्रासंगिक लगा। गीता का जीवन में उतरना ही वास्तविक उत्सव की बात है। अगर आप मेरे जीवन में ये प्रकाश नहीं लाते, तो मैं इस विशेष अवसर से चूक जाती। और इस अवसर पर बस वो ही सामान्य लोगों की तरह उपभोगतावाद को बढ़ावा देने को ही उत्सव मान लेती। हम इस तरह के मौकों पर भी तैयार बैठे होते हैं कि कितना अधिक से अधिक वस्तु-पदार्थों का उपभोग करें। मुझे ख़ुशी है, मैं प्रसन्न हूँ और संतुष्ट हूँ कि मैं गीता प्रतिभागी हूँ। और एक दिन नाम लेकर काम पूरा कर लिया, जैसी बात भी नहीं है। रोज़ गीता है, रोज़ नई चुनौती है, रोज़ नया अध्याय है, रोज़ कुछ सीखना है। आचार्य जी का हृदय से धन्यवाद।🙏🙏🙏































