
Mamta Jaiswal
samajna hi nahi chahte hai na prakriti ko na hi apne swasthya ko bus swad k peeche or dikhawe k liye dekho hum kya kya khate hai or bus chal raha hai sab ase hi
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samajna hi nahi chahte hai na prakriti ko na hi apne swasthya ko bus swad k peeche or dikhawe k liye dekho hum kya kya khate hai or bus chal raha hai sab ase hi

ममता जी, आपने जो देखा वह दूसरों पर रखिए नहीं, अपने ऊपर भी उतनी ही सीधी नज़र डालिए। "सब ऐसे ही चल रहा है" कहना आसान है, पर असली सवाल यह है कि आपकी अपनी थाली में, आपके अपने खरीदने और खाने में, कितना ज़रूरत का है और कितना स्वाद या दिखावे का। जब तक यह दूसरों की आदत बनी रहती है, देखना आसान रहता है; जिस दिन यही प्रश्न अपने निवाले पर आ जाए, वहीं असली परीक्षा शुरू होती है। अगली बार थाली उठाने से पहले एक क्षण रुककर पूछिए कि शरीर को चाहिए या मन को।