
✍️ आचार्य जी प्रणाम 🙏 नदी है तो तीर है, तृषा है तो नीर है। कभी ये रूप, कभी वो देश, तटिनी तय करे तट का वेश। नदी (अहंकार) है तो तीर (आत्मा)। मैं सोचती रही सालों से कि मैं कैसे जानूँ कि मैं हूँ कौन? एक बात, जब मैं आचार्य जी को नहीं सुनती थी, तब मुझे छुईमुई, कोमल अपने नाम से ज़्यादा ये शब्द अपने लिए भाते थे। क्यों? इसका कारण साफ था कि कोई चाहिए था जीवन में जो मुझे सहारा दे, क्योंकि मैं तो कोमल हूँ। जीवन बदलता है हमारी नीयत से। हम क्या बने बैठे हैं, ये हमारा बनना ही हमारी ज़िंदगी बनता है। शनिवार को मैं जब पचमढ़ी के चौरागढ़ पर्वत की चढ़ाई कर रही थी, तब मुझे समझ आया कि हम खुद को क्या माने बैठे थे और अगर उसी मानने को चुनौती दी जाए, तो एक व्यक्ति अपने ही भ्रम को कैसे काट सकता है। सतपुड़ा का चौरागढ़ महादेव पर्वत समुद्र तल से 1,326 मीटर (4350 फीट) है, जहाँ पर उतार-चढ़ाव में भी कुल सीढ़ियाँ 1500 से 2000 तक या इससे ज़्यादा बताई जाती हैं। जब हमने चलना शुरू किया, तब दिन के 2 बजे थे और सूरज भी तप रहा था। मैं न जिम जाती हूँ, न ही बहुत ज़्यादा रनिंग करती हूँ, इसलिए बहुत डर था कि कहीं ऐसा न हो कि रास्ते में ही तबीयत खराब हो जाए, क्योंकि मुझे साँस की परेशानी भी हो जाती है जब ज़्यादा चलती हूँ या बीपी कम हो जाता है। कमर का भी ऑपरेशन हुआ है पहले, तो ये सारे डर मुझ पर हावी हो रहे थे कि कहीं कुछ हो गया तो मैं कभी अकेले नहीं जा पाऊँगी कहीं भी। हमें पहले ही बताया गया था कि वहाँ कोई मेडिकल सुविधा उपलब्ध नहीं है, न ही वहाँ नेटवर्क होता है कि नीचे से कोई आपातकालीन व्यवस्था प्राप्त की जा सके। मेरे साथ जो ग्रुप था, वो सभी स्टूडेंट थे और सभी 30 से अंदर की उम्र के थे, इसलिए उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी क्योंकि सभी युवा थे। जो कपल थे, वे भी एक-दूसरे के साथ थे। सिर्फ मैं ही ऐसी थी जिसके साथ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो मेरी सहायता कर सके। अब चढ़ाई शुरू की। धीरे-धीरे मैं आगे बढ़ती जा रही थी, थोड़ा रुकते-रुकते, ताकि कोई शारीरिक परेशानी बाधा न बने। बार-बार आचार्य जी की बातें याद आती रहीं कि 80 की उम्र की हो जाओ, तब भी पूछूँगा कि गाना गाती हो, साइकिल चलाती हो या नहीं। गला साथ न दे तो सुनो, कान साथ न दें तो पढ़ो, पर रुक मत जाना। मैंने देखा कि मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हूँ, वैसे-वैसे मेरे भीतर से कमजोरी और शारीरिक लगाव, तनाव कम होता जा रहा था। बल्कि एक जोश आ रहा था कि करना है बस, चाहे जो हो जाए। बैठूँगी नहीं, वापस नहीं जाऊँगी। मैं देख रही थी कि इसी बीच हमारे साथ वाले जोड़े अपनी-अपनी महिला पार्टनर का बड़ा ध्यान रख रहे हैं, उन्हें मोटिवेट कर रहे हैं, उनका हाथ पकड़कर चढ़ा रहे हैं। मैं मन ही मन सोच रही थी कि ये आचार्य जी के गीता सत्रों में होतीं, तो आज इन्हें किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती। 🙂 मैंने जब श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 5 को सुना, तो समझ आया कि अर्जुन है तो कृष्ण को होना पड़ेगा। अगर मैं कमज़ोर हूँ, तो मेरे ही भीतर वो ताकत भी है जो उस कमज़ोरी को दूर कर सकती है। बस अपनी शारीरिक वृत्ति को खुद पर हावी नहीं होने देना है, क्योंकि हम जो मानते हैं, वही हम और ज़्यादा होते जाते हैं। मैं वहाँ एक ही भजन गा रही थी: मैनूं कौन पछाणे, मैं कुझ हो गई होर नी।। हादी मैनूं सबक़ पढ़ाया, ओत्थे होर न आया-जाया, मुतलिक जात जमाल विखाया, वहदत पाया ज़ोर नी।। क्योंकि वहाँ मुझे अपनी पुरानी मान्यता, पहचान टूटती दिख रही थी। और ये प्रेम सिर्फ आचार्य जी ने सिखाया है, जहाँ अपनी उच्चतम संभावना की ओर बढ़ना होता है, अपनी कमजोरियों को काटते हुए। पर ये भी मेरी पहचान नहीं बन जाए कि, वाह! मैंने कर दिखाया, नहीं तो अहंकार यहाँ भी मोटा हो जाता है। ये एक परिवर्तन है जो मेरे जन्मदाता आचार्य जी की वजह से आया है। 🙏 नमन आचार्य जी 🙏♥️















































