ShobhaMai ko horror muvi dekhti hu to us kidar ki tarh hi dar darti hu jab vo kidar bach kar rahat ki sans leta h to mai bhi rahat leti hu …
Talking Mirror
शोभा जी, आप जिस डर और राहत की बात कर रही हैं, वह सिर्फ़ फ़िल्म के पात्र तक सीमित नहीं है। अँधेरे से डरना, अकेले रास्ते पर डरना, किसी स्त्री के साथ हो रहे अन्याय पर तकलीफ़ होना — ये सब पहले से आपके भीतर मौजूद डर और चोट के बिंदु हैं, फ़िल्म सिर्फ़ उन्हें छूकर जगा देती है। इसलिए सवाल यह नहीं कि पात्र को क्या हुआ, सवाल यह है कि आपके अपने जीवन में वह असुरक्षा और वह चोट कहाँ से आई है जो किसी स्त्री पर हुई ज़्यादती को देखकर इतनी गहराई से हिल जाती है। अगली बार जब ऐसा दृश्य आपको भीतर तक छू जाए, वहीं रुककर देखिए कि यह दर्द असल में किस पुराने अनुभव या भय से जुड़ा है।


















