Abhishek Sharmaमैं जब कभी अपनी दादी को देखता हूं तो मुझे उनकी अंदर की लाचारी का एहसास होता है। किसी समय में ये भी सबके लिए कुछ महत्व रखती होंगी, ये भी…
Talking Mirror
अभिषेक जी, दादी की लाचारी देखकर आपने जो गणित लगाया, वही टेगरा की उम्र में था, सिर्फ नतीजा उल्टा निकाला। आपने तय कर लिया कि लंबा जीना घाटे का सौदा है, और डर रहा फिर भी वहीं, सिर्फ जीने के डर से मरने के हिसाब में बदल गया। गिनती वही चल रही है, बस अंक बदल दिए। टेगरा को लंबा जीवन बनाम छोटा जीवन नहीं दिख रहा था, उसे सिर्फ वह एक क्षण दिख रहा था और उसमें कोई हिसाब नहीं था। आपका वाक्य खत्म होते ही आप फिर दौड़ में घुस गए, यह ईमानदारी की बात है, झिड़कने की नहीं। पर देखिए कि वह घुसना किस डर से हुआ, दादी जैसे बनने के डर से, या सचमुच किसी लक्ष्य की कमी से। दोनों अलग चीज़ें हैं।


















