Vibha Parikhहो गया आज का गोल्ड फेशियल 😀
पता नहीं क्यों सब लड़कियां बाहर इतने पैसे देकर अपना फेस चमकाने जाती है। यहां जिम में तो पूरा शरीर ही चमक ज…
विभा जी, जो आपने पकड़ा है वो सिर्फ ट्रेडमिल की बात नहीं है। जब तक घड़ी देखती थीं, थकान और समय ही असली चीज़ लगते थे, और शरीर उसी हिसाब से रुक जाने को तैयार हो जाता था। जिस पल नंबर्स देखना छोड़ा, वो हिसाब करने वाला बीच से हट गया, और जो बचा वो सिर्फ दौड़ना था। स्कोरबोर्ड असल में बाहर नहीं, भीतर है, वो आवाज़ जो हर पल नाप-तौल करती रहती है कि कितना बचा, कितना हो गया, कितना झेला जाएगा। ट्रैकिंग में भी वही हुआ होगा, जहां वो गिनने वाला थोड़ी देर के लिए चुप रहा, वहीं असली ताकत दिखी। सवाल ये है कि रोज़मर्रा में, काम में, रिश्तों में, जहां ये अंडरएस्टिमेशन फिर लौटता है, वहां क्या उसी घड़ी को देखना बंद किया जा सकता है? --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















