
किचन के काम से लेकर PAF मैं काम करने तक का सफर ✨ आज भी याद है मुझे वो दिन जब मैं अपनी किचन में खड़े होकर खाना पका रही थी, मेरा बेटा मेरे पास ही खड़ा, मेरे कपड़े खींच रहा था रो रो कर खेलने की जिद कर रहा था वो बस अभी तीन साल का ही था लेकिन मेरी हिम्मत नहीं थी कि इतने काम और थकान के बाद उसके साथ खेल भी पाऊं, क्योंकि उस समय मैं फिर से प्रेगनेंट भी थी। क्योंकि ये बात बिल्कुल दिमाग में घुसी हुई थी कि बच्चे दो तो होने ही चाहिए फिर भले ही उसके लिए तुम्हारा जीवन नर्क ही क्यों न बन जाये। मैं सोच रही थी कि क्या अब यही जीवन है, ऐसे ही जीना है, बहुत तनाव था स्वास्थ भी खराब था, कई बार मरने का मन करता था लेकिन बेटे की वजह से कभी ऐसा नहीं किया। बार बार सोचती थी कि पहले तो मुझे कितना कुछ बोला गया था कि ध्यान रखा जाएगा, किसी बात की कोई कमी नहीं होगी अब ये सब मैं अकेले ही झेल रही हूं। मै अपनी हर एक बात, हर एक खुशी के लिए दुसरों पर निर्भर थी, खुद को असहाय और बेचारी बनाने में मैने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कही कुछ रास्ता नहीं दिखता था पति ऑफिस से घर आकर बोलते आज मीटिंग हुई, इंक्रीमेंट हुआ, आज प्रमोशन हुआ, तब मुझे नकली खुशी दिखानी पड़ती क्योंकि नहीं थी मैं खुश, उनके हर एक प्रमोशन में मुझे मेरी नाकायबी दिखती, क्योंकि मैने बच्चे पैदा करने के लिए अपनी सेंट्रल स्कूल की जॉब छोड़ी थी, जो कि इतनी आसानी से लगती भी नहीं है। मुझे बस अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था, वहां से भागना चाहती थी लेकिन कहां ?? मम्मी पापा ने बचपन से यही सिखाया था कि ये तुम्हारा घर नहीं है, तो बस रोना, पछताना और अपनी किस्मत को कोसना ही बचा था। फिर एक दिन एक रील दिखी आचार्य जी की, लगा कि कोई मेरे लिए बोल रहा है जीवन में पहली बार।। फिर एक वीडियो, दो वीडियो हर दिन देखने लगी काम के बाद बस जल्दी से यू ट्यूब पर आचार्य जी के वीडियो सुनना, यही होने लगा। और समझ आने लगा कि मैं कहा फंस चुकी हूं? समझ आने लगा कि मैं जिस हालत में हूं उसका जिम्मेदार कोई और नहीं मै खुद हूं। साथ साथ एक हिम्मत भी आती गई, आचार्य जी समझाते गये मै समझती गई। जब मेरी बेटी 6 महीने की थी तब मैने एक कंपनी में घर से ही काम करना शुरू किया, फिर गीता सेशन ज्वाइन किए, उसके बाद तो जैसे नए पंख ही मिल गए थे मुझे, स्कूटी चलाना सीखा, कार भी सीखी, और वहां से अब तक का जो सफ़र रहा है वो बस सिर्फ सीखने का था गलतियों को सुधारना फिर कभी पीछे मुड़कर ही नहीं देखा। उसके बाद एक, दो नौकरी और बदली लेकिन काम बस पैसे कमाने के लिए नहीं करना था मुझे जीवन को दिशा देनी थी, सार्थक काम करना था जिसमें मै अपने समय को एक सही काम में लगा पाऊं। और अब मुझे संस्था मै काम करते हुए तीन महीने से ज्यादा हो गए है, अब मैं बहुत अच्छे से कह सकती हूं कि हां एक ऐसी जगह भी है काम करने के लिए जहां आप हर दिन सीखते हो, आप हर दिन बेहतर होते हो। हंसा पाये मान सरोवर, ताल तलैयों मै क्यों डोले 🙏🙏 और काम के साथ अब मैं अपने बच्चों की भी परवरिश अच्छे से कर पा रही हूं। क्योंकि अगर मैने आचार्य जी को नहीं सुना होता तो मैं भी वही सब अपने बच्चों को सिखा रही होती जो मुझे सिखाया गया था। लेकिन मेरे साथ मेरे बच्चों को भी बचा लिया आचार्य जी ने 🙏 आचार्य जी ने सिखाया कि ये जीवन हमारा है और इसकी पूरी जिम्मेदारी भी हमारी है हम इसे जैसे चाहे वैसा बना सकते है। अब मुझे समझ आ रहा है कि कितने बंधन मैने खुद पर यूँही लगा रखे थे जिनकी जरूरत भी नहीं थी। और हां अब मरने का विचार तो दूर दूर तक नहीं आता आचार्य जी ने जो नया जीवन दिया है उसमें ऐसी बातें ही नहीं है उसमें तो बस खुद के साथ साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाना है। धन्यवाद आचार्य जी 🙏















































