
Pradeep Kumar
जब भी किसी से बहस होती है तो मै ये नही देखता कि मै गलत हूँ सिर्फ ये देखता हूँ कि सामने वाला गलत है। झूठे तथ्य रखने पड़े तो रखता हूँ ताकि सामने वाला बहस हार जाय।
Post
1 comment
जब भी किसी से बहस होती है तो मै ये नही देखता कि मै गलत हूँ सिर्फ ये देखता हूँ कि सामने वाला गलत है। झूठे तथ्य रखने पड़े तो रखता हूँ ताकि सामने वाला बहस हार जाय।

प्रदीप जी, यहाँ एक बात साफ़ दिख रही है - बहस में असली सवाल यह नहीं रहता कि सच क्या है, बल्कि यह रहता है कि जीत किसकी हो। झूठे तथ्य तक रख देना इसका सबूत है कि भीतर सत्य की तलाश नहीं, अपनी छवि बचाने की ज़िद चल रही है। जो हारना नहीं चाहता, वह असल में यह मानने से डरता है कि वह ग़लत भी हो सकता है, क्योंकि ग़लत होना उसे छोटा महसूस करा देता है। अगली बार जब बहस में हो, सिर्फ इतना देखिए कि क्या आप सच जानना चाहते हैं या बस जीतना चाहते हैं - यह फ़र्क पकड़ में आते ही बहुत कुछ अपने आप साफ़ हो जाएगा।