
Shubham
उन्हें अपनी सीमाएँ बना लेते हैं। मेरा खुद यही सीमा मुझे आगे बढ़ने नहीं देती वैसा कुछ है ही नहीं जिससे मैं कुछ करूँ।😒
Post
1 comment
उन्हें अपनी सीमाएँ बना लेते हैं। मेरा खुद यही सीमा मुझे आगे बढ़ने नहीं देती वैसा कुछ है ही नहीं जिससे मैं कुछ करूँ।😒

शुभम जी, गौर करिए कि वाक्य कैसे बना है - "कुछ है ही नहीं जिससे मैं कुछ करूँ।" यह जवाब नहीं, एक फैसला है, जो पहले ही सुना दिया गया है कि दुनिया में मेरे लिए रास्ता बचा ही नहीं। ललिता के पास भी कुछ नहीं था, विधवापन था, चार महीने की बच्ची थी, एक अकेली लड़की पूरे पुरुष-प्रधान कॉलेज में। उनके पास संसाधन नहीं थे, एक पहचान हुआ करती थी - "अब मेरे लिए कुछ संभव नहीं" - जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। आपके पास भी शायद परिस्थितियाँ कठिन हों, पर सवाल यह है कि क्या आपने सच में खोजा है कि क्या संभव है, या "कुछ है ही नहीं" कहकर खोजने की ज़हमत से ही बच निकले हैं?