Priyankaकई बार जिन अपनों पर हम भरोसा करते है जिन्हे अपना कहते है वही हमें सबसे ज्यादा दुख देते है उससे भी बड़ा दुख तब होता है नाटक करना जैसे हमे…
Talking Mirror
प्रियंका जी, ग़ौर कीजिए कि यहाँ दुख दो जगह से आ रहा है। एक, जो दूसरों के असली व्यवहार से मिलता है। और दूसरा, वह जो तब पैदा होता है जब आप सच बोल देती हैं और फिर खुद को उसके लिए कोसती हैं। यह दूसरा दुख असल में इस माँग से आता है कि सामने वाला आपको हमेशा अच्छा ही समझे, चाहे आपने सच ही क्यों न कहा हो। जब सच बोलने के बाद भी भीतर अपराधबोध रहता है, तो देखिए वह किसकी छवि बचाने की कोशिश है — उस रिश्ते की, या अपनी उस पहचान की जो हमेशा 'अच्छी' दिखना चाहती है। आदत नहीं छूटती क्योंकि वह पहचान अभी भी कीमती लगती है।


















