🧔🏻♂️ आचार्य प्रशांत से मिलना चाहते हैं? लाइव सत्रों का हिस्सा बनें: https://acharyaprashant.org/hi/enquir... 📚 आचार्य प्रशांत की पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं? फ्री डिलीवरी पाएँ: https://acharyaprashant.org/hi/books?... ➖➖➖➖➖➖ #acharyaprashant #climatechange #judiciary #media #election #pollution #river वीडियो जानकारी: 09.11.2025, कोलकाता विवरण:- हम अक्सर उम्मीद करते हैं कि सरकार, अदालत, प्रशासन या मीडिया मिलकर समाज की बड़ी समस्याओं को ठीक कर देंगे। लेकिन अगर इन सभी संस्थाओं को चलाने वाले लोग उसी समाज से आते हैं, तो क्या केवल संस्थाओं को बदलने से मूल समस्या बदल जाएगी? इस चर्चा में आचार्य प्रशांत जलवायु संकट के संदर्भ में इस सवाल को उठाते हैं कि हम बार-बार अदालत, सरकार और दूसरी संस्थाओं से समाधान की उम्मीद क्यों करते हैं। बातचीत में यह बात सामने आती है कि संस्थाएँ अपने आप में स्वतंत्र नहीं होतीं; वे उन्हीं लोगों और उनकी सोच से बनती हैं जो समाज में मौजूद हैं। इसलिए संस्थागत व्यवस्था के भीतर से छोटे सुधार संभव हो सकते हैं, लेकिन किसी मूलभूत बदलाव के लिए केवल संस्था को बदलना पर्याप्त नहीं हो सकता। चर्चा आगे बढ़कर इस बात पर आती है कि जब किसी व्यवस्था का उद्देश्य खुद को बनाए रखना हो, तो क्या वह अपने भीतर से ऐसा परिवर्तन ला सकती है जो उसके मूल आधार को ही बदल दे। जलवायु संकट के मामले में भी सवाल केवल यह नहीं है कि कौन-सी संस्था क्या कर रही है, बल्कि यह है कि समाज स्वयं किन बातों को महत्व देता है और किन्हें नज़रअंदाज़ कर देता है। मुख्य विषय: संस्थाएँ और समाज की चेतना जलवायु संकट और हमारी प्राथमिकताएँ व्यवस्था के भीतर सुधार या मूलभूत बदलाव संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~~~~~~