
हिन्दू धर्म में हर वर्ष दो बार नवरात्रि के रूप में देवी की पूजा की जाती है। नवरात्रि का हर दिन देवी के विभिन्न रूपों को समर्पित होता है। इन्हीं दिनों में देवी को याद करते हुए 'देवी महात्म्या' या 'श्रीदुर्गासप्तशती' का पाठ करने की परंपरा है। इस ग्रंथ को देवी उपासना की परंपराओं में उतना ही ऊँचा स्थान प्राप्त है जितना ऊँचा वेदांत में श्रीमद्भगवद्गीता को है। यह ग्रंथ मार्कंडेय पुराण में पायी जाती है।
मधु-कैटभ, महिषासुर, शुंभ-निशुंभ के वध की कथा अत्यंत लोकप्रिय हैं। लेकिन क्या हम को उनका वास्तविक अर्थ पता है? पौराणिक कहानियाँ में गहरे अर्थ छिपे हैं, जिन्हें यदि नहीं समझा गया तो आप कथा के पूर्ण लाभ से वंचित रह जाते हैं।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए, श्रीदुर्गासप्तशती पर आधारित इस शृंखला की रचना की गई है। जहाँ आचार्य प्रशांत ने सभी कथाओं में छिपे वेदांत के सूत्रों को सरल व उपयोगी भाषा में समझाया है और नवरात्रि के सुंदर पर्व को नए व गहरे अर्थ प्रदान किए हैं।
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