
अक्सर हम धर्म पर यह लांछन लगाने से नहीं चूकते कि सनातन धर्मग्रंथों ने ही जाति बँटवारा करवाया है।
कौन से उपनिषद् से जाति व्यवस्था आयी है?
अगर उपनिषदों से आयी है तो पाकिस्तान में क्यों अहमदियों की पिटाई है?
और शिया और सुन्नी क्यों लड़ रहे हैं?
क्यों सिक्खों में जाट सिख अलग हैं और दूसरे अलग हैं, और क्यों जो पाकिस्तान से आए हैं उनको भापा बोलते हैं?
क्योंकि बात हिंदू की, मुस्लिम की या सिक्ख की है ही नहीं, जब भीतर सब कुछ खंडित है, बँटा-बँटा, तो हम बाहर भी बँटवारा कर ही डालते हैं। हम अपने प्रति इतनी ज़्यादा हीनता से भर गए हैं कि हमें ऐसा लगता है कि सारी बुराइयाँ तो सनातन धर्म में ही है।
एक लक्षण से मुक्ति चाहिए या पूरी बीमारी से ही? पूरी बीमारी से अगर मुक्ति चाहिए तो तरीका सिर्फ़ एक है — ज़िंदगी को देखना पड़ेगा, मन को समझना पड़ेगा। नहीं तो कुएँ से निकलकर खाई की तरफ़ भागने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।
पाएं पूर्ण स्पष्टता जाति और धर्म के मुद्दे पर इस वीडियो सीरीज़ में। आप इसे स्वजनों में भी साझा कर सकते हैं।
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