विराट प्रकृति, पर सीमित साधन: मानव विस्तार की त्रासदी

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प्रलय : कर्मफल, कर्म, कर्ता
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40 मिनट
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क्या आपने कभी सोचा है कि हमारा निरंतर बढ़ता हुआ भोग और हमारी इच्छाएँ आखिर कहाँ तक पूरी हो सकती हैं? क्या हम सच में समझते हैं कि अधिक से अधिक पाने की हमारी आदतें हमें वास्तविक संतुष्टि दे सकती हैं? या फिर क्या यह केवल एक अंतहीन दौड़ है, जिसमें हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के बजाय, और अधिक खालीपन महसूस करते हैं?

आचार्य प्रशांत हमें यह समझाते हैं कि चाहे हम जितना चाहें, हमारी पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं। यहां तक कि अगर हम अमेरिकियों की तरह उपभोग करना शुरू कर दें, तो 17 पृथ्वियाँ भी हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगी। हमने अपनी जीवनशैली और बढ़ती जनसंख्या के बीच इस संतुलन को खो दिया है, और परिणामस्वरूप हम अपनी पृथ्वी के संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल रहे हैं। हमारी बढ़ती इच्छाओं और असंतुलित जीवनशैली के कारण हम प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं। क्या हमारी पूरी सभ्यता इतनी विकसित होते हुए भी असुरक्षित क्यों महसूस करती है? आचार्य जी हमें यह सिखाते हैं कि हम प्रकृति के एक अभिन्न हिस्से के रूप में जन्मे हैं, और अगर हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, तो हम ही इसका असर भुगतेंगे।

क्या हम अपनी इच्छाओं में बदलाव लाकर इस संकट से उबर सकते हैं?

आईये, इन सवालों का जवाब एक नए दृष्टिकोण से समझें, आचार्य प्रशांत के इस वीडियो श्रृंखला के माध्यम से।

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