
मैं ब्राह्मण हूँ।
मैं ठाकुर हूँ।
मैं शूद्र हूँ।
मैं वैश्य हूँ।
इस तरह की बातें आपने लोगों के मुख से अपनी जाति बतलाते वक्त सुनी होंगी। कई बार तो आपने यह भी देखा होगा कि इस तरह के वाक्य लोग बड़े घमंड के साथ अपनी गाड़ी पर भी लिखवा देते हैं। और हवाला ये देते हैं कि:
भाई क्यों न लिखें जाति, आखिरकार जाति भी तो धर्म और वेदों की देन है?
हमने तो बस अपने धर्म और वर्ण का पालन किया है। इसमें क्या बुराई है?
जाति का उल्लेख वेदों में भी तो है हम तो वेदों की शिक्षा का पालन कर रहे हैं, इसमें क्या ग़लत है?
यह तर्क अगर आप कहीं भी सुनते हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि:
जाति का जन्म से कोई संबंध नहीं है
जाति का समर्थन वेदांत नहीं करता
जाति का धर्म से कोई लेना देना नहीं है
अगर आपको यह बात सत्य नहीं लग रही हैं तो आपको प्रमाण दिए देते हैं। Google पर search करिए निरालंब उपनिषद् और वज्रसूचिका उपनिषद्। इनके श्लोकों को पढ़िए आप स्वयं समझ जाएंगे कि वेदांत कहीं से भी जातिप्रथा का समर्थन नहीं करता है और जाति से धर्म का कोई लेना देना नहीं है।
और अगर यह मेहनत करने से बचना चाहते हैं तो आचार्य जी ने स्वयं इस वीडियो सीरीज़ में इस मुद्दे पर खुल कर बातचीत की है। आचार्य जी ने उपनिषद् के श्लोकों के माध्यम से पूरी सच्चाई सामने रख दी है। और तो और उन्होंने यह भी बताया है कि जाति पूरी तरह से सामाजिक है।
इस मुद्दे पर पूरी जानकारी के लिए इस वीडियो सीरीज़ को देखें और लाभ उठाएं। आप इसे स्वजनों में भी साझा कर सकते हैं।
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