
जो जीवन के निष्ठुर और निर्मम थपेड़े झेलने को तैयार हों, वो जीवन से सीखें। और अगर चाहते हैं कि जीवन कष्टों की झाड़ी सा न प्रतीत हो तो गुरुजनों और संतो की शरण में आएंँ क्योंकि जीवन तो निर्मम होता है, लेकिन गुरु निर्मम नहीं होता है। गुरू शरीर रूप में है इसलिए उसमें करुणा होती है, जीवन आपसे करुणा नहीं रखता है।
जो कहते हैं की मैं जीवन से सीखूंगा मुझे गुरु की आवश्यकता नहीं है वे अभी जीवन को समझने में भूल कर रहे हैं। अब ये चुनना आपके ऊपर है कि आप अपनी समझ को वरीयता देते हैं या संतो की सीख को।
कैसे जानें संतो की सीख?
कैसे बचें इस जीवन के महा दुख से?
कुछ ऐसे ही प्रश्नों का जवाब हम जानेंगे इस पाठ्यक्रम में आचार्य प्रशांत के साथ इस सरल कोर्स में।
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