
हमसे अगर कोई सवाल करें कि जीवन में सबसे कीमती क्या है, तो हम “प्रेम” का नाम ज़रूर लेंगे।
अपनों से लेकर देश-धर्म और पशुओं तक, प्रेम ही प्रेम। हमारे रिश्तों का हर पहलू प्रेम पाने की चेष्टा में लगा रहता है।पर जिसे हम प्रेम कहते हैं, क्या वही अपेक्षाओं की शक्ल नहीं ले लेता है? और अपेक्षा पूरी न हो तो फिर नाराज़गी ? प्रेम आदत बन जाता है और आचार्य प्रशांत कहते है आदत में समझ नहीं होती, बस प्रतिक्रिया होती है। यह होश का चुनाव नहीं रह जाता। जब प्रेम आदत, पकड़ और निर्भरता बन जाता है, रूमी उस पर एक सीधा सवाल रखते हैं।
क्या कोई कदम ऐसा भी हो सकता है जो शरीर की चाल से नहीं, समझ से उठे?
इस वीडियो श्रृंखला में आचार्य प्रशांत रूमी की इसी बात को खोलते हैं कि प्रेम अगर सच है, तो वह बाँधेगा नहीं तो, मुक्त करेगा।
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