
जीवन जैसा हम जी रहे होते हैं, उसमें केवल हम अशांति को ही जान रहे होते हैं। मन की जितनी सामग्री है वह लगातार आपको अशांत बनाए रखती है। हम अशांत होते हैं इसलिए और अशांति चुनते हैं — इस उम्मीद में कि शांत हो जाएंँगे।
जानने समझने वालों ने कहा कि हमेशा उसके साथ रहना जो सदा अस्पर्शित रहे, जिसको न कुछ विचलित करता हो, न प्रभावित करता हो। मगर ऐसे की संगति कैसे करें?
हम जैसे हैं, वैसे ही रहते हुए क्या हम बुद्ध पुरुष को जान सकते हैं?
क्या बुद्ध पुरुष सिर्फ़ हमारे मन की एक कल्पना है?
कुछ ऐसे ही प्रश्नों का जवाब हम जानेंगे इस पाठ्यक्रम आचार्य प्रशांत के साथ इस सरल कोर्स में।
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