
देखना इस जहाँ को जैसे ना देखा,
अपनी नज़र को नज़र न मानना
हमें अक्सर लगता है कि प्रेम तो हम जानते ही हैं। नज़रें मिलना, दिल धड़कना और एक मीठा-सा एहसास।
लेकिन क्या ये नज़रें हमें सच्चाई दिखाती हैं? या हर बार की तरह सिर्फ़ धोखा ही दे जाती है?
संत रूमी के प्रेम-काव्य की इस तीसरी कड़ी में आचार्य प्रशांत देखने के इसी तरीके पर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं।
यह वीडियो सीरीज़ हमें स्वयं और दुनिया को एक साफ़ दृष्टि से देखना सिखाती है ताकि जीवन के छोटे-बड़े फैसले विवेक और सही समझ के साथ लिए जा सकें।
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