
जीवन हमें किस लिए मिला है?
क्या करना है इस बचे हुए जीवन का?
हम हर पल स्वयं को संसार से घिरा हुआ पाते हैं और सोचते हैं कि बाहरी कोई वस्तु हमें सुख दे देगी। अध्यात्म में साफ़–साफ़ देख लेना होता है कि मेरे स्वार्थों की पूर्ति भी मुझे शांति नहीं दे पा रही है।
शांति इसलिए नहीं मिलती क्योंकि संसार की प्रभुता यानि आकर्षण, मन पर हर समय हावी रहता है। और यही आकर्षण का विषय, मन का भगवान हो जाता है। लेकिन जिन्होंने इस आकर्षण को जाना समझा, वे आकर्षण के पार निकल गए और संसार से सही रिश्ता रखना सीख गए।
वैसे तो यह ग्रंथ हज़ारों वर्ष पुराना है परन्तु आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या इसको आज की पीढ़ी के लिए अत्यंत सरल व प्रासंगिक बना देती है। अपरोक्षानुभूति के प्रकाश में अपने जीवन को एक नई दिशा दीजिए, आचार्य प्रशांत के साथ इस सरल कोर्स में।
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