✍🏻 पोस्ट 1 | 8 अक्टूबर '26
💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स
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🚽 स्कूलों में शौचालय बने, पर उनका रखरखाव मुश्किल क्यों?
2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन शुरू हुआ। स्कूलों में भी लड़कों और लड़कियों के लिए अलग शौचालय उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया।
12 साल बाद निर्माण और उपलब्धता के स्तर पर भारत ने लंबी दूरी तय की है। लेकिन सवाल अब यह है: क्या सुविधा सिर्फ़ मौजूद है, या रोज़ इस्तेमाल के लायक भी है?
📊 WHO-UNICEF के Joint Monitoring Programme (JMP) के अनुसार, भारत के स्कूलों में बुनियादी पेयजल सुविधा 2015 के 55% से बढ़कर 2025 में 97% हो गई।
इसी अवधि में बुनियादी स्वच्छता 62% से बढ़कर 81% हुई और बिना किसी स्वच्छता सुविधा वाले स्कूल 27% से घटकर 14% रह गए। 164 देशों में केवल 5 देशों में पेयजल सुविधा में सुधार की गति भारत से अधिक रही। 2025 में दुनिया का औसत बुनियादी पेयजल 78% और बुनियादी स्वच्छता 77% था।
📚 UDISE+ 2025–26 के अनुसार, भारत के 98.5% स्कूलों में लड़कियों का शौचालय उपलब्ध है। 99.5% स्कूलों में सुरक्षित पेयजल, 96.9% में हाथ धोने की सुविधा और 95% में बिजली उपलब्ध है। वहीं 58.2% स्कूलों में रैंप व हैंडरेल और केवल 40.1% में दिव्यांग बच्चों के अनुकूल शौचालय हैं।
👧 शौचालय केवल स्वच्छता की सुविधा नहीं, शिक्षा से भी जुड़ा है। 2017 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि स्कूलों में शौचालय निर्माण, खासकर लड़कियों के लिए अलग शौचालय, किशोरियों के नामांकन में महत्वपूर्ण सुधार से जुड़ा था।
UDISE+ 2025–26 में कक्षा 9–12 की लड़कियों की वार्षिक ड्रॉपआउट दर 5.7%, जबकि लड़कों की 8.3% है। NFHS-6 (2023–24) में 10 या उससे अधिक वर्ष की शिक्षा प्राप्त महिलाओं का अनुपात NFHS-5 के 41% से बढ़कर 46.4% हुआ।
लेकिन यह प्रगति हर जगह समान नहीं है। ग्रामीण महिलाओं में 10 या उससे अधिक वर्ष की शिक्षा का अनुपात 39.7%, जबकि शहरी महिलाओं में 61.5% है।
15–24 वर्ष की युवतियों में स्वच्छ मासिक धर्म सुरक्षा साधनों का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 3/4, जबकि शहरों में लगभग 9/10 है। स्कूल में साफ़ शौचालय और बहता पानी ग्रामीण किशोरियों की मासिक धर्म के दौरान उपस्थिति के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
⚠️ असली चुनौती अब रखरखाव की है।
UDISE+ के अनुसार 38,994 स्कूलों में लड़कियों का शौचालय बना है, लेकिन काम नहीं कर रहा, जबकि 22,366 स्कूलों में लड़कियों का शौचालय है ही नहीं। यानी 61,360 से अधिक स्कूल, लगभग 4%, अभी इस स्थिति में हैं।
24 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में कम-से-कम 95% स्कूलों में लड़कियों का कार्यशील शौचालय है। लेकिन मेघालय में यह 72.4%, अरुणाचल प्रदेश में 74.4%, त्रिपुरा में 74.7% है, जबकि मिजोरम और नागालैंड में यह 80% से कम है।
राजस्थान में 7,726 और मध्य प्रदेश में 6,188 स्कूलों में लड़कियों के शौचालयों को मरम्मत की जरूरत है।
📜 यहाँ आँकड़ों को समझना भी जरूरी है। UDISE+ के अनुसार 97% स्कूलों में
कम-से-कम एक कार्यशील शौचालय है, जबकि JMP में बुनियादी स्वच्छता 81% है।
दोनों प्रणालियाँ अलग परिभाषाओं और तरीकों से आँकड़े जुटाती हैं, इसलिए इन प्रतिशतों की सीधी तुलना नहीं की जानी चाहिए।
UDISE+ में कार्यशील शौचालय के लिए पानी, सीट, जलनिकासी, नियमित सफाई, कम दुर्गंध, पहुंच और बंद होने वाला दरवाजा जैसी शर्तें देखी जाती हैं।
🪞 फर्क सिर्फ़ शौचालय का नहीं है। फर्क यह है कि हम किसी चीज़ के बन जाने को ही उसके निभ जाने का प्रमाण मान लेते हैं।
कोई आदत बना ली, कोई संकल्प लिया, कोई रिश्ता शुरू किया और तुरंत मान लिया, “हो गया।” लेकिन जो रोज़ देखभाल माँगता है, उसकी जिम्मेदारी से हम कितनी जल्दी हट जाते हैं?
शौचालय का बन जाना एक बार की उपलब्धि है। उसे साफ़, सुरक्षित और लगातार इस्तेमाल के लायक बनाए रखना रोज़ की जिम्मेदारी है।
🪞 देख लेना अपने आप में बदलाव नहीं है। जब तक नीयत रोज़ की दिशा में नहीं उतरती, “हो गया” भी सिर्फ़ एक और आँकड़ा बन सकता है।
❓ आपके जीवन में ऐसा क्या है, जिसकी उपलब्धि आप गिनते हैं, लेकिन जिसे रोज़ निभाने की जिम्मेदारी की ओर अब तक नहीं देखते?
🔗 स्रोत:
The Hindu
https://www.thehindu.com/education/toilets-are-now-built-in-most-schools-but-maintanence-lags-behind-data/article71546382.ece