अवलोकन🪞🪞🪞
⏳“कितने घंटे की ड्यूटी है आपकी?”
जब भी कोई मुझसे यह सवाल पूछता है, तो मेरे पास इसका कोई निश्चित जवाब नहीं होता। ऐसा नहीं है कि संस्था में काम शुरू करते समय कोई समय-सीमा तय नहीं की गई थी। समय तो बताया गया था, लेकिन धीरे-धीरे मेरे लिए काम को केवल उस समय-सीमा में बाँधकर देखना संभव नहीं रहा।
🙏"आचार्य जी कहते हैं कि प्रेम में वो वादे भी निभ जाते हैं जो कभी किए ही नहीं।"
शायद संस्था के काम के साथ भी मेरा रिश्ता कुछ ऐसा ही बनता जा रहा है। यहाँ काम करने के लिए जितना समय निर्धारित है, उससे कहीं अधिक महत्त्व इस बात का है कि काम मुझसे क्या माँग रहा है और मैं उसके प्रति कितनी ईमानदार हूँ।
जब मैंने शुरुआत की थी, तब मैं समय के हिसाब से काम करती थी। निर्धारित समय पर काम शुरू करना, अपने लक्ष्य पूरे करना लेकिन इसके बावजूद भीतर एक असंतुष्टि बनी रहती थी। लगता था कि कुछ छूट गया है, कुछ अधूरा रह गया है। मैं काम तो कर रही हूँ, लेकिन क्या वास्तव में काम को वह सब दे पा रही हूँ, जो आज जरूरत है?
धीरे-धीरे मैं आगे बढ़ी तब मुझे समझ आने लगा कि इस काम में केवल निर्धारित समय पूरा कर देना पर्याप्त नहीं है। यहाँ आधे-अधूरे मन से काम नहीं चल सकता। यह काम मुझसे केवल मेरे कुछ घंटे नहीं, बल्कि मेरी पूरी ऊर्जा, मेरी समझ, मेरी ईमानदारी और मेरा १०० प्रतिशत माँगता है।
🍀इसका अर्थ यह नहीं कि समय, स्वास्थ्य या दूसरी जिम्मेदारियाँ महत्त्वहीन हो जाती हैं। बल्कि इसका अर्थ यह है कि काम के प्रति मेरी आंतरिक प्रतिबद्धता केवल घड़ी देखकर तय नहीं होती। मैं अपने समय का उपयोग कैसे करती हूँ, कितनी सजगता से काम करती हूँ और अपने हिस्से की जिम्मेदारी कितनी पूरी करती हूँ, यह अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
🙏आचार्य जी की एक बात मुझे बार-बार याद आती है कि अगर आप एक पैर बोट के बाहर और एक अंदर रखेंगे तो चीर फाड़ होगी ।
इस काम में भी यही होता है। अगर मैं संस्था के काम के लिए तो कुछ घंटे निकाल दूँ, लेकिन जीवन के बाकी हिस्से को पहले की तरह ही चलाते रहने की जिद करूँ, तो मेरे भीतर लगातार खींचतान चलती रहेगी।
मैं न तो नए काम को पूरी तरह अपना पाऊँगी और न ही अपने पुराने ढर्रे को छोड़ पाऊँगी। न इस काम के साथ न्याय कर पाऊँगी, न अपने जीवन में कोई वास्तविक परिवर्तन ला पाऊँगी। अंततः मुझे यही लगने लगेगा कि यह काम बहुत कठिन है, इसे कर पाना संभव नहीं है।
लेकिन सवाल यह है कि जब मैं किसी युद्ध में खड़ी हूँ, तो क्या मैं उसी समय किसी दूसरी दिशा में जाने की कल्पना कर सकती हूँ?
जब सामने एक चुनौती है, तो क्या मैं अपना पूरा ध्यान उस चुनौती पर लगाए बिना उससे लड़ सकती हूँ?
अगर काम मेरे जीवन का हिस्सा भर है, तो शायद मैं उसे बाकी चीजों के बीच एक जगह दे दूँगी। लेकिन अगर काम मेरे जीवन को बदलने का माध्यम है, तो फिर मैं उसे केवल एक जिम्मेदारी की तरह कैसे देख सकती हूँ?
अगर काम जीवन नहीं बन रहा, तो फिर काम कैसा है?
🪷संस्था के काम और बाकी जगहों के काम में अंतर
अगर बाहरी ढाँचे को देखें, तो संस्था में भी बाकी जगहों की तरह ही काम होता है। यहाँ भी लक्ष्य हैं, जिम्मेदारियाँ हैं, समय-सीमा है, प्रदर्शन का आकलन है और परिणामों की अपेक्षा है। तो फिर अंतर क्या है?
बाकी जगहों पर काम शुरू करने से पहले अक्सर हमारी योग्यता, शैक्षणिक पृष्ठभूमि, अनुभव और न उम्र को देखा जाता है।
यहाँ आपके पास पहले से बहुत सारी योग्यताएँ होना आवश्यक नहीं है । आप आचार्य जी की शिक्षाओं से जुड़े हैं, उन शिक्षाओं आपके जीवन को प्रभावित किया है और आप उस बदलाव को दूसरों तक पहुँचाना चाहते हैं। आपके भीतर सीखने और काम करने की ईमानदार इच्छा है, तो आप शुरुआत कर सकती हैं और उम्र की कोई सीमा नहीं।
मुझे जो मिला है, उसे दूसरों तक पहुँचाना है। और इस प्रक्रिया में जो कुछ मेरे भीतर स्पष्ट होता जाएगा, उसे और बेहतर तरीके से बाँट पाऊँगी।
बाकी जगहों पर अक्सर एक निश्चित काम सीखकर हम एक निर्धारित ढर्रे पर चलने लगते हैं। सुबह काम पर जाना, दिनभर वही काम करना और शाम को घर लौट आना। समय के साथ वेतन बढ़ सकता है, पद बदल सकता है और अनुभव भी बढ़ सकता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि उस व्यक्ति के भीतर भी कोई वास्तविक परिवर्तन आए।
संभव है कि वह अपने काम में अधिक कुशल हो जाए, लेकिन क्या वह अपने डर को पहचान पा रहा है? क्या वह अपनी कमजोरियों को देख पा रहा है? क्या उसका जीवन पहले से अधिक स्पष्ट, स्वतंत्र और सार्थक हो रहा है?
कई बार व्यक्ति अपने काम में इतना अभ्यस्त हो जाता है कि काम उसे चुनौती देना बंद कर देता है। वह एक निश्चित ढर्रे पर चलता रहता है और धीरे-धीरे उसका काम केवल पैसे कमाने का माध्यम बनकर रह जाता है।
यहाँ हर दिन एक नई चुनौती सामने आती है। कई बार हर घंटे, हर बातचीत और हर निर्णय में कुछ नया सीखने का अवसर होता है। यहाँ पहले से तय नहीं होता कि मैं बिल्कुल इसी तरीके से काम करूँगी और परिणाम भी वैसा ही आएगा जैसा मैंने सोचा है।
मुझे परिस्थितियों को समझना पड़ता है, अपनी रणनीति बदलनी पड़ती है, अपनी गलतियों को स्वीकार करना पड़ता है और फिर से प्रयास करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में केवल काम की चुनौतियाँ सामने नहीं आतीं, बल्कि मेरे भीतर की कमजोरियाँ भी सामने आती हैं।
एक दिन मुझे अपनी कोई कमजोरी दिखाई देती है। मैं उस पर काम करती हूँ और लगता है कि अब शायद सब ठीक हो गया है। लेकिन अगले ही दिन दो और कमजोरियाँ सामने आ जाती हैं। कभी वे इतनी असहज और डरावनी लगती हैं कि उनसे बचने का मन करता है। कभी लगता है कि इस चुनौती से दूर भाग जाना ही आसान होगा।
लेकिन कुछ ही समय बाद मैं खुद को फिर से उसी काम में लगी हुई पाती हूँ।
शायद यही इस काम की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ केवल परिस्थितियों से नहीं लड़ना पड़ता, बल्कि अपने भीतर मौजूद डर, आलस्य, असुरक्षा, सीमित समझ और पुरानी आदतों से भी लड़ना पड़ता है।
यहाँ सबसे पहली योग्यता है — छात्र बने रहना
इस काम में मुझे सबसे अद्भुत बात यह लगती है कि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। मुझे हर दिन सीखना है, हर परिस्थिति से सीखना है और अपनी गलतियों से भी सीखना है।
मैं चाहे कितनी भी जिम्मेदारी संभाल लूँ, मुझे यह मानकर नहीं चलना है कि अब मुझे सब कुछ आ गया है। मुझे लगातार अपनी समझ को परखना है, अपनी कार्यशैली में सुधार करना है और यह देखना है कि मुझसे कहाँ चूक हो रही है।
इसलिए मेरे लिए इस काम की पहली शर्त किसी विशेष डिग्री या अनुभव से भी पहले एक अच्छा विद्यार्थी बने रहना है।
छात्रता ही पात्रता है।
अगर मेरे भीतर सीखने की इच्छा नहीं है, अगर मैं अपनी गलती को स्वीकार नहीं कर सकती, अगर मैं यह मानकर बैठ जाती हूँ कि मुझे सब आता है, तो फिर मेरे भीतर विकास की संभावना कैसे बचेगी?
यहाँ पद और जिम्मेदारी बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि मैं अपने आपको पहले से अधिक महत्त्वपूर्ण समझने लगूँ। बल्कि जिम्मेदारी बढ़ने के साथ मुझे और अधिक सजग, विनम्र और जवाबदेह होना पड़ता है।
दूसरी जगहों पर प्रमोशन मिलने पर व्यक्ति अपने पद और उपलब्धियों के कारण स्वयं को बड़ा समझने लग सकता है। लेकिन यहाँ जिम्मेदारी बढ़ने के साथ मेरे सामने स्वयं को देखने और समझने की चुनौती भी बढ़ती जाती है। काम में मेरी भागीदारी जितनी बढ़ती है, उतना ही आवश्यक हो जाता है कि मैं अपनी सीमाओं को पहचानूँ और अपने भीतर की कमियों पर काम करूँ।
कई बार जिम्मेदारियाँ इतनी अधिक होती हैं कि स्वयं के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता। लेकिन शायद यही वह जगह भी है, जहाँ मुझे काम करते हुए स्वयं को देखना सीखना है। मेरे व्यवहार, मेरे निर्णयों, मेरी प्रतिक्रियाओं और मेरे काम करने के तरीके में ही मेरे बारे में बहुत कुछ छिपा है।
इस काम ने मुझे मेरे सामने खड़ा किया है
अगर मैं अपने भीतर आए बदलाव को देखूँ, तो मुझे महसूस होता है कि पहले मैं किसी से अपनी बात कहने से पहले सौ बार सोचती थी। सही बात पर भी बोलने में संकोच होता था। मन में कई सवाल उठते थे—क्या मैं सही हूँ? सामने वाला क्या सोचेगा? कहीं उसे बुरा तो नहीं लगेगा? कहीं मेरी बात गलत तो नहीं समझ ली जाएगी?
इस डर के कारण कई बार मैं वह बात भी नहीं कह पाती थी, जिसे कहना आवश्यक था।
लेकिन अब काम की प्रकृति ही ऐसी है कि मुझे बोलना पड़ता है। अगर कोई काम सही तरीके से नहीं हो रहा है, तो मुझे उसे स्पष्ट रूप से बताना पड़ता है। अगर किसी जिम्मेदारी में कमी है, तो मुझे उस कमी की ओर ध्यान दिलाना पड़ता है। अगर मुझे अपनी टीम का मार्गदर्शन करना है, तो केवल अच्छा लगने वाली बातें कहने से काम नहीं चलेगा।
मुझे तथ्यों को देखना होगा, सही बात को स्पष्टता से रखना होगा और जरूरत पड़ने पर कठिन बातचीत भी करनी होगी।
यह सब मेरे लिए सहज नहीं रहा है। लेकिन अब मैं समझ पा रही हूँ कि किसी बात को कहने से पहले मेरा यह सोचना कि सामने वाला मेरे बारे में क्या सोचेगा, भी एक प्रकार का बंधन है। अगर मैं हर समय अपनी छवि बचाने में लगी रहूँगी, तो फिर जिम्मेदारी कैसे निभाऊँगी?
मुझे यह सीखना है कि मेरी प्राथमिकता अपनी छवि को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि जो सही है, उसके प्रति ईमानदार रहना हो।
मुझे अपनी बात कहने की क्षमता विकसित करनी है, लेकिन उसके साथ विनम्रता, स्पष्टता और जिम्मेदारी भी बनाए रखनी है। केवल बोलना सीखना पर्याप्त नहीं है; सही बात को सही तरीके से कह पाना भी जरूरी है।
मेरी मेहनत को एक दिशा मिली है
जब मैं अपने अतीत को देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि मेरे पास कोई बहुत विशेष योग्यता नहीं थी। एक चीज जरूर थी—मैं मेहनत करना जानती थी। लेकिन मेरी मेहनत को किस दिशा में लगना चाहिए, इसका स्पष्ट बोध नहीं था।
मेहनत होती थी, लेकिन यह समझ हमेशा नहीं होती थी कि उस मेहनत से मेरे भीतर या मेरे जीवन में क्या बदलना चाहिए।
संस्था के काम ने मेरी मेहनत को एक दिशा दी है। अब केवल अधिक काम कर लेना मेरे लिए पर्याप्त नहीं है। मुझे यह भी देखना है कि मैं काम कैसे कर रही हूँ, कहाँ गलती कर रही हूँ, किस चीज से बच रही हूँ और किन क्षमताओं को विकसित करने की जरूरत है।
मैं काम की जरूरत के अनुसार अपने भीतर बदलाव लाने की कोशिश कर रही हूँ। जहाँ मुझे स्पष्ट बोलना चाहिए, वहाँ स्पष्ट बोलना सीख रही हूँ। जहाँ मुझे धैर्य रखना चाहिए, वहाँ धैर्य विकसित करने का प्रयास कर रही हूँ। जहाँ मुझे अपनी टीम से जवाबदेही माँगनी चाहिए, वहाँ केवल संकोच के कारण पीछे न हटने का अभ्यास कर रही हूँ।
मैं यह दावा नहीं कर सकती कि ये सभी बदलाव मेरे भीतर पूरी तरह आ चुके हैं। अभी भी कई कमजोरियाँ सामने आती हैं। अभी भी कई परिस्थितियों में मुझे स्वयं को संभालना पड़ता है। लेकिन अब कम-से-कम मैं उन कमजोरियों को देखकर उनसे भागने के बजाय उन पर काम करने का प्रयास कर रही हूँ।
मेरे लिए यह बदलाव महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अब मेहनत केवल काम पूरा करने का साधन नहीं रह गई है। वह मेरे स्वयं के विकास का माध्यम भी बन रही है।
अंततः, मैं इस काम से क्या चाहती हूँ?
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ आता है कि संस्था में काम करने का अर्थ केवल कुछ लक्ष्य पूरे करना, कुछ लोगों का मार्गदर्शन करना या अपनी जिम्मेदारियाँ निभा देना नहीं है। ये सब काम के आवश्यक हिस्से हैं, लेकिन इनके साथ एक और प्रक्रिया चल रही है—मैं स्वयं को जानने और बदलने की प्रक्रिया से गुजर रही हूँ।
यह काम मुझे बार-बार मेरी सीमाओं के सामने खड़ा करता है। कभी मेरी समझ की कमी सामने आती है, कभी मेरे भीतर का डर, कभी मेरी असंगति और कभी मेरी जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति। हर बार मेरे सामने एक अवसर होता है कि मैं या तो उस कमजोरी को उचित ठहराऊँ या उसे स्वीकार करके उस पर काम करूँ।
मैं यह नहीं कह सकती कि मैं पूरी तरह बदल चुकी हूँ। लेकिन इतना जरूर समझ पा रही हूँ कि अब मेरे सामने बदलाव की दिशा स्पष्ट है। अब मुझे पता है कि मेहनत केवल कितनी की गई, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है; मेहनत किस दिशा में की गई और उससे मेरे भीतर क्या परिवर्तन आया, यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
मैं इस काम में केवल बेहतर प्रदर्शन करने के लिए नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनने के लिए भी लगी हूँ।
और शायद इसीलिए आज मेरे लिए यह सवाल कि मैं कितने घंटे काम करती हूँ, उतना महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है, जितना यह सवाल कि मैं अपने काम के प्रति कितनी ईमानदार हूँ, कितनी सजग हूँ और अपने जीवन को बदलने के लिए कितनी तत्पर हूँ।
क्योंकि अगर काम करते हुए भी मैं वही बनी रहती हूँ जो पहले थी, अपनी पुरानी कमजोरियों को जस का तस बनाए रखती हूँ और अपने जीवन को देखने का मेरा नजरिया नहीं बदलता, तो फिर इस काम से मैंने वास्तव में पाया क्या?
मेरे लिए इस काम का अर्थ है—हर दिन सीखना, हर दिन स्वयं को देखना, हर दिन अपनी सीमाओं को चुनौती देना और हर दिन पहले से थोड़ा अधिक ईमानदार बनने का प्रयास करना।
काम केवल वह नहीं है, जो मैं करती हूँ। काम वह भी है, जो काम करते हुए मेरे भीतर घट रहा है।
और मैं चाहती हूँ कि यह प्रक्रिया कभी रुके नहीं।
मुझे इतना सुंदर अवसर देने के लिए बहुत बहुत आभार।
धन्यवाद PAF 🙏🙏🙏