Acharya Prashant (AP) Books | 🔥 Emotions versus logic 🔥
🔥 Emotions versus logic 🔥
तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
ख़ास पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का कॉम्बो भारी छूट पर! स्त्री + वेदान्त + भावनाएँ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन में प्रकाश लाएँ।
स्त्री:
आज़ाद जीवन एक आज़ाद मन की अभिव्यक्ति है। यदि व्यक्ति का मन मुक्त नहीं है तो मुक्ति आंदोलन शायद ही कभी अपने उद्देश्य की पूर्ति कर पाएँगे। स्त्री का वस्तुकरण ही उसकी दासता का प्रमुख कारण है।
इस दासता से मुक्ति तभी सम्भव है जब स्त्री ख़ुद को वस्तु-मात्र न समझे। दुनिया स्त्री का शोषण करती है उसे एक भौतिक वस्तु जानकर, और स्त्री उस शोषण को सहती है क्योंकि देह से उसने अपना तादात्म्य बैठा लिया है।
इस अति महत्वपूर्ण पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने करुणापूर्वक शरीर का सही स्थान बताया है, उसके आग्रहों पर सुझाव दिया है, और स्त्री के मन की मुक्ति के मार्ग पर प्रकाश डाला है, जो कि ना केवल उसे आंतरिक बल प्रदान करता है बल्कि उसकी उच्चतम की ओर यात्रा को एक उड़ान देता है।
वेदान्त:
आत्म-जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य अपना सबसे कीमती संसाधन, अपना जीवन ही खोता चलता है। चिन्ता कर-करके कुछ हासिल भी कर लिया तो ये कभी नहीं समझ पाता कि जो हासिल किया उसकी कीमत क्या, और वह हासिल करने के लिए जो गँवाया, उसकी कीमत क्या! यही कारण है कि सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में आत्म-जिज्ञासा को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत वेदान्त के मूल सिद्धांतों को समझाते हैं और प्रमुख उपनिषद् सूत्रों में छुपे गूढ़ रहस्यों को सरलता के साथ उजागर करते हैं। यह पुस्तक एक भेंट है उनके लिए जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं, साथ-ही-साथ उनके लिए भी जिन्होंने अपनी यात्रा बस अभी शुरू ही की है।
प्रेम सीखना पड़ता है:
हम जिसे प्रेम कहते हैं वह हम तक मात्र किस्से-कहानियों और फिल्मों के माध्यम से पहुँचा है। ये भी एक ग़लतफ़हमी है कि प्रेम नैसर्गिक होता है। प्रकृति में, जानवरों में जो प्रेम दिखता है वो प्राकृतिक सौहार्द हो सकता है, प्रेम नहीं।
प्रेम तो सीखना पड़ता है।
प्रेम वास्तव में है मन का निरंतर आकर्षण, सतत प्रवाह शांति की तरफ़। प्रेम का वरदान या प्रेम की संभावना तो बस इंसान को ही मिली है। वो भी संभावना मात्र है।
प्रेम मिलेगा किसी कृष्ण जैसे के पास।
भावनाएँ:
हमारी ज़िन्दगी पर भावनाऍं अक्सर बहुत हावी रहती हैं और सिर्फ़ भावनाओं के चलाए ही हम चल रहे होते हैं।
क्या हैं भाव? जिसे हम भाव कहते हैं, वो और कुछ नहीं है, वो विचार ही है जो घना हो गया है।
भावनाऍं अपने आपमें न अच्छी हैं न बुरी हैं — भावनाऍं बाहरी हैं। बाहर से कोई भी विचार भीतर प्रवेश करता है और उसी को आप अपना भाव बोलने लगते हैं। फिर हमारी पसंद-नापसंद, हमारे चुनाव और पूरा जीवन उन्हीं भावों के चलाए चलते हैं।
भाव शारीरिक हैं, पशुओं में भी होते हैं, और वेदान्त कहता है तुम चेतना हो। आचार्य प्रशांत की यह पुस्तक आपको आपके भावों और उनके स्रोत से परिचित करवाने का एक प्रयास है। जिससे कि आपके चुनाव भाव आधारित नहीं, बोध आधारित हों, आत्मिक हों।