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Paperback Details
HindiLanguage
88Print Length
Description
कबीर साहब का भजन “नहिं मानै मूढ़ गँवार” मनुष्य के भीतर बैठी उस आत्मरक्षा की वृत्ति पर प्रकाश डालता है जिसके कारण संतों, ऋषियों और विचारकों को बार-बार एक ही बात को अलग-अलग तरीकों से कहना पड़ता है। बात सीधी होती है, पर अहंकार उसे स्वीकार नहीं करना चाहता।
प्रस्तुत पुस्तक में भजन की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अहंकार अपनी अलग सत्ता बचाए रखना चाहता है जिसके लिए वह कल्पनाओं, मान्यताओं और झूठी धारणाओं की दीवारें खड़ी करता है, और अपने ही बंधनों को सुरक्षा का नाम दे देता है। संत-जन सदियों से इसी दीवार को तोड़ने का करुणापूर्ण प्रयास करते आए हैं, ताकि मनुष्य अपने बंधनों को देख सके।
आचार्य प्रशांत वेदांत के आलोक में बताते हैं कि इन भ्रमों और बंधनों से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने भीतर सक्रिय डर, मोह, झूठे आग्रहों और समझने से इनकार करने वाली वृत्ति को प्रत्यक्ष देखे। सज्जन-संगति और संतों की वाणी हमें हमारी वास्तविक स्थिति के सामने खड़ा करती है। जो अहंकार के सुरक्षा के उपायों और अपने बंधनों को और गहराई से समझना चाहते हैं, यह पुस्तक उनके लिए बोधपूर्ण जीवन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।