माया तजूँ तजि नहिं जाइ | Maya Tajun Taji Nahin Jaye [New Release]

माया तजूँ तजि नहिं जाइ | Maya Tajun Taji Nahin Jaye [New Release]

संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
Hindi Language
142 Print Length
Description
धन माया है! स्त्री माया है! घर-परिवार माया है!

निश्चित ही आपने भी इनमें से कुछ या सभी बातें अपने जीवन में सुनी या कही होंगी। प्रचलित धर्म में हमेशा से ऐसे कुछ चुनिंदा विषयों को माया कहा गया और हमें उनसे दूरी बनाने के लिए सुझाया गया है। और इसी कारण एक आम मन सदैव इस दुविधा में रहता है - क्या छोड़ूँ और क्या पकड़ूँ?

संत कबीर के इस क्रांतिकारी भजन पर आधारित प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत 'माया' की पारंपरिक और वास्तविक समझ के अंतर को स्पष्ट करते हैं। वे इस आम भ्रांति को ख़ारिज करते हैं कि माया सिर्फ़ कुछ विषयों (जैसे पैसा, स्त्री, मोह-ममता) तक ही सीमित है, जिन्हें समाज या लोकधर्म निंदित कहता आया है।

पुस्तक में की गई भजन की वेदांतिक व्याख्या आपका ध्यान त्यागने वाले विषयों से हटाकर त्यागने वाले पर लाती है। माया कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर झूठे ज्ञान, झूठी मान्यताओं और धारणाओं पर टिकी होती है। आचार्य प्रशांत के शब्दों में: “जहाँ एक अज्ञानी के लिए मंदिर का प्रसाद भी बंधन बन जाता है, वहीं आत्मज्ञानी के लिए पूरा ब्रह्मांड बस एक 'खेल' है।”

यह पुस्तक भजन की एक-एक पंक्ति के अर्थ के माध्यम से माया की परतों को उघाड़ती है। यह आपको माया को छोड़ने की नहीं, बल्कि माया को समझने की दिशा में ले जाती है जहाँ छोड़ने या नहीं छोड़ने का चुनाव स्पष्ट हो जाता है। 'छोड़ने' और 'पाने' की अंतहीन जंग से ऊपर उठकर सहज जीवन जीने की दिशा में यह पुस्तक आपके लिए एक आमंत्रण है।
Index
CH1
न जानना ही माया है
CH2
आदर और मान: माया के दो रूप
CH3
सत्य का तल बनाम व्यवहार का तल: जीवन की परीक्षा
CH4
अहंकार की चालाकी: कमज़ोरी और सहारे की माया
CH5
अज्ञानी के लिए माया, ज्ञानी के लिए खेल
CH6
देह-भाव और कामना की माया
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क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है? आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
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