
आचार्य जी की कुछ पुस्तकें पढ़ने के बाद से ही खुद में बदलाव तो आने लगा था, लेकिन इसके चलते घर-परिवार और दोस्तों के साथ बदलते रिश्तों को लेकर मन परेशान रहता था। इस पुस्तक के पहले दो अध्याय पढ़ते ही लोगों के तानों की तरफ़ देखने का नज़रिया ही बदल गया। यहाँ आचार्य जी हमारा ध्यान सीधा मूल पर ले जाते हैं, जिससे सबकुछ साफ़ दिखाई देने लगता है और समझ आने लगता है कि इस "पागलपन" में ही असली मौज है। पुस्तक के ...