
मैंने ये किताब सिर्फ title देखकर उठाई थी—“जात: आज की क्या जात है?”—और honestly, ये उम्मीद से कहीं ज्यादा गहरी निकली। हम अक्सर जाति को सिर्फ एक social issue की तरह देखते हैं, लेकिन इस किताब में इसे मन की समस्या के रूप में समझाया गया है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि असली भेद बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर बैठा हुआ है—हम खुद को और दूसरों को अलग-अलग मानते हैं, वहीं से समस्या शुरू होती है। किताब पढ़ते हुए ...