
इस पुस्तक में न कठिन साधनाएँ हैं, न उपदेश कि “ऐसा बनो, वैसा बनो।” यह बस एक बात कहती है— देखो। ध्यान से देखो। देखो कि कैसे हमारा अहंकार हर सोच, हर रिश्ता और हर चाहत में खुद को सुरक्षित करना चाहता है और उसी कोशिश में खुद को बाँध लेता है। आचार्य प्रशांत की बात खास इसलिए लगती है क्योंकि वे इन पुराने सूत्रों को आज की ज़िंदगी से जोड़ देते हैं l सोशल मीडिया की बेचैनी, रिश्तों की उम्मीदें, सफल होने की द...