
आचार्य जी की बुक को पढ़ने से अपने अहम् का पता चला है कि जिसको हम मैं मैं बोलते है वो असल में मैं नही है वो हमारे भीतर का अहम् है जो अपने आप को पूर्ण करने के लिए किसी वस्तु या विषय का उपयोग करता है। लेकिन अहम् की पूर्णता तो भोगने से पूर्ण नही होगी , अहम् की पूर्णता स्वयं अहम् को जानकर ही पूर्ण होगी।