
नवीन श्रृंखला: लघु पुस्तक

तुम भेड़ नहीं, फिर भेड़ के पीछे क्यों?” एक छोटी लेकिन बहुत गहरी सोच देने वाली किताब है। यह हमें यह समझाती है कि हम अक्सर बिना सवाल किए समाज और भीड़ के पीछे चलने लगते हैं, और यही हमारी सबसे बड़ी भूल होती है। इस किताब की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यह सीधे और सरल शब्दों में हमारी आदतों और सोच पर सवाल उठाती है। इसे पढ़ते समय कई बार ऐसा लगा कि यह किताब मेरे ही जीवन के फैसलों पर रोशनी डाल रही है। इसने मुझ...

परिवार, संस्कृति, स्कूल, कोचिंग संस्थान, कॉलेज आदि ये सब व्यवस्थाएं हैं। और हम इन व्यवस्थाओं के द्वारा चलाए जाते रहने से मान लेते हैं कि हम तो भेड़ हैं। हमें चलाने के लिए सदा एक व्यवस्था चाहिए। यह पुस्तक हमारी इसी मानसिकता (भेड़ चाल) को ध्वस्त कर हमें वो रोशनी देती है जिसमें हम देख पाएं कि किसी व्यवस्था के द्वारा संचालित न होकर भी जीवन जिया जा सकता है।