
Stree hokar sirf stree ke najariye s ya sirf emotional tarike se duniya ko na dekhna balki ek insaan ki tarah sochna...

अनुपमा जी, यह जो बात आपने कही, इसको थोड़ा और भीतर देखिए। सवाल यह नहीं है कि स्त्री के नज़रिए से देखें या इंसान के नज़रिए से — सवाल यह है कि देखने वाला कौन है, कोई पहचान भी देखने में बाधा बनती है तो वह पहचान चाहे 'स्त्री' हो, चाहे 'इंसान', चाहे कोई और लेबल। अगर मैं खुद को पहले से तय किसी श्रेणी में बाँधकर दुनिया को देखूं, तो देखना वहीं से शुरू होता है जहाँ वह श्रेणी मुझे ले जाती है, न कि वहाँ से जो...