प्रणाम आचार्य जी मैं इस किताब का रिव्यू रोमन में लिख रहा था फिर मुझे आपकी कुछ बातें याद आईं और मैंने सोचा हिंदी में लिखू लेकिन मैं लिख नहीं पा रहा था तो मैंने फिर वही हिंग्लिश में लिखा और लास्ट में सॉरी लिख दिया फिर मुझे आभाष हुआ में नशा से निकलना ही नहीं चाहता हूं मैं सॉरी लिख रहा हूं और मैंने सोचा मैं क्यों नहीं लिख रहा हूं तो मैं उसके लिए अतीत को दोस दे रहा हूं कि कभी फोन हिंदी में मैंने चलाया ...