
पहले मैं भी अज्ञान में बच्चों को नैतिकता/संस्कारित करती थी कि बड़े चाहे गलत भी हो उनके सामने मुहँ नहीं खोलना, बिना कुछ पूछे पूजा पाठ करना, बातें मानना आदि लेकिन जब से ये किताब मैंने पढ़ी है तब से बच्चों को ऊँची संगति, ऊँची किताबें देने लगी हूँ, तन और मन दोनों से उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश रहती हैं, गलत पर आवाज़ उठाना, सही के प्रति झुकना/सम्मान रखना सीखा रहीं हूँ