मन + भावनाएँ + प्रेम सीखना पड़ता है + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

मन + भावनाएँ + प्रेम सीखना पड़ता है + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
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Description
सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
मन + भावनाएँ + प्रेम सीखना पड़ता है + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

मन:

मन क्या है? मन अपनेआप में एक व्यवस्था है जिसमें तमाम विचारों और भावनाओं की लहरें उठती-गिरती रहती हैं। मन को वास्तव में कहीं पहुँचना नहीं है। बल्कि इच्छा करना, इच्छित वस्तु को पाना, भोगना, फिर असन्तुष्ट हो जाना, फिर इच्छा करना, इसी दुष्चक्र में घूमते रहना मन का प्रयोजन है। मन की प्राकृतिक व्यवस्था में ऊँचाई या गहराई के लिए कोई जगह नहीं है।

जहाँ तक हमारी बात है, हमारा प्रयोजन है एक आज़ाद और भरपूर जीवन जीना जिसमें कोई चक्रवत बाध्यता न हो। पर मन में उठती लहरें हमारे नियन्त्रण में नहीं होती हैं। मन हमसे पूछकर नहीं चल रहा होता। हाँ, हम ज़रूर मन के ग़ुलाम बन जाते हैं। तो मन के अनुसार चलने का मतलब ही है एक बहुत-बहुत गहरी ग़ुलामी।

प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत हमें बताते हैं कि मन की दासता में जीना कोई अनिवार्यता नहीं है। मन तो अहम् की छाया मात्र है, तुम अपनेआप को जैसे परिभाषित करोगे, तुम अपनी जो मान्यता रखोगे, मन वैसा ही हो जाएगा। तो मन की सूक्ष्मताओं को गहराई से समझने और आपको मन के पार ले जाने में यह पुस्तक अवश्य सहायक सिद्ध होगी।

भावनाएँ:

हमारी ज़िन्दगी पर भावनाऍं अक्सर बहुत हावी रहती हैं और सिर्फ़ भावनाओं के चलाए ही हम चल रहे होते हैं।

क्या हैं भाव?
जिसे हम भाव कहते हैं, वो और कुछ नहीं है, वो विचार ही है जो घना हो गया है।

भावनाऍं अपने आप‌में न अच्छी हैं न बुरी हैं — भावनाऍं बाहरी हैं। बाहर से कोई भी विचार भीतर प्रवेश करता है और उसी को आप अपना भाव बोलने लगते हैं। फिर हमारी पसंद-नापसंद, हमारे चुनाव और पूरा जीवन उन्हीं भावों के चलाए चलते हैं।

भाव शारीरिक हैं, पशुओं में भी होते हैं, और वेदान्त कहता है तुम चेतना हो। आचार्य प्रशांत की यह पुस्तक आपको आपके भावों और उनके स्रोत से परिचित करवाने का एक प्रयास है। जिससे कि आपके चुनाव भाव आधारित नहीं, बोध आधारित हों, आत्मिक हों।

प्रेम सीखना पड़ता है:

हम जिसे प्रेम कहते हैं वह हम तक मात्र किस्से-कहानियों और फिल्मों के माध्यम से पहुँचा है। ये भी एक ग़लतफ़हमी है कि प्रेम नैसर्गिक होता है। प्रकृति में, जानवरों में जो प्रेम दिखता है वो प्राकृतिक सौहार्द हो सकता है, प्रेम नहीं।

प्रेम तो सीखना पड़ता है।

प्रेम वास्तव में है मन का निरंतर आकर्षण, सतत प्रवाह शांति की तरफ़। प्रेम का वरदान या प्रेम की संभावना तो बस इंसान को ही मिली है। वो भी संभावना मात्र है।

प्रेम मिलेगा किसी कृष्ण जैसे के पास।
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