😍 अब बोध का साथ कहीं भी, कभी भी 😍

😍 अब बोध का साथ कहीं भी, कभी भी 😍

तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
5/5
8 Ratings & 2 Reviews
Description
सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
हनुमान चालीसा का वेदान्तिक अर्थ + दुर्गासप्तशती सार + झुन्नूलाल + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

हनुमान चालीसा का वेदान्तिक अर्थ:

आप हनुमान जी को बस ऐसे सोचो कि 'भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे' — माने रास्ते में जा रहे हैं और भूतों से बहुत डर लगता है तो बीच-बीच में पाठ करते रहते हैं — तो ये दुरूपयोग कर लिया हनुमान का। फिर आप समझे ही नहीं कि हनुमान किसके प्रतीक हैं। धर्म में सिर्फ़ प्रतीक होते हैं, तथ्य तो वहाँ होते ही नहीं। और उन प्रतीकों को पढ़ना पड़ता है, देखना पड़ता है कि इनका इशारा किधर को है। जो इशारा नहीं समझते, उनके लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है।

बहुत लोग हैं पश्चिम में जो कहते हैं कि भारतीय वानरों की पूजा करते हैं, 'द मंकी गॉड'। उनको नहीं समझ में आ रहा कि क्या दिखाया जा रहा है, क्योंकि वानर हम सब हैं। शरीर से हम सब बिलकुल वानर ही हैं पर वानर होते हुए भी कैसे राम की ओर बढ़ा जा सकता है, इसके प्रतीक हैं हनुमान, 'मंकी गॉड' नहीं हैं। अब ये जाने बिना हनुमान भक्ति कर रहे हो तो क्या कर रहे हो? बस वही कि परीक्षा में पास करवा देना, नौकरी दिला देना, पत्नी दिला देना, या और कामनाएँ। उसमें क्या है?

जब तक उनके वानर रूप का अर्थ नहीं जाना, जब तक ये नहीं जाना कि हम सब वानर हैं और वानर होते हुए भी हृदय में राम हो सकते हैं, तब तक हनुमान आपके लिए सार्थक नहीं हुए। और सिर्फ़ वेदान्त के ही आधार पर किसी भी बात की, कथा की या दर्शन की व्याख्या की जा सकती है। वेदान्त कुंजी है, उसी से सारे ताले खुलेंगे। वेदान्त ये नहीं कह रहा कि बाकी दरवाज़ों पर मत जाओ, सिर्फ़ एक दरवाज़े से प्रवेश करो; वेदान्त कह रहा है सब दरवाज़ों पर जाओ लेकिन कुंजी यहाँ से मिलेगी। वो कुंजी नहीं ली तो कोई दरवाज़ा नहीं खुलेगा तुम्हारे लिए। वेदान्त अपनेआप में कुछ है नहीं, एक कुंजी भर है। वो कुंजी ले लो फिर तुम्हें जिस धारा में प्रवेश करना हो, कर लो।

दुर्गासप्तशती सार:

वर्ष में दो बार धूमधाम से नवरात्रि मनाई‌ जाती है, नौ दिन देवी पूजा होती है, पर क्या हम सचमुच इस पर्व और देवी के मर्म को समझते हैं?

श्रीदुर्गासप्तशती, जो नवरात्रि का केंद्रीय ग्रंथ‌ है, उसमें जीवन के रहस्य को समझने के लिए अनेकों प्रतीकों का प्रयोग किया गया है — प्रकृति, पशु-पक्षी, असुर, देवता, और देवी स्वयं। ये प्रतीक हमारे जीवन‌ में किस प्रकार सार्थक हैं? इनका आज के संदर्भ में क्या अर्थ है?

इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत बड़े ही अनूठेपन व सरलता से इन प्रतीकों का अर्थ बताते हैं और इनका आज के जीवन में उपयोग समझाते हैं।

यह पुस्तक दुर्गा सप्तशती ग्रंथ को सार रूप में आप तक लाने का एक प्रयास है।

झुन्नूलाल:

झुन्नूलाल का नाम तो आपने सुना ही होगा!
यदि नहीं, तो आइए झुन्नू से आपका परिचय एक कहानी के माध्यम से कराते हैं।

झुन्नू सुई ढूँढ रहा है और उसके लिए पूरे मोहल्ले में खूब भाग-दौड़ कर रहा है। धनिया, माने मिसेज़ झुन्नू, आग-बबूला हुई बाहर आती हैं और फूट पड़ती हैं — नुन्नू की परवाह नहीं तुम्हें, अपनी सुई खोजने में लगे हो! ये तो बताओ कि आखिर सुई खोयी कहाँ थी?

झुन्नू: अ ब ब... घर के अंदर!

धनिया: जो भीतर खोया है उसे बाहर क्यों ढूँढ रहे हो?

झुन्नू: पर भीतर तो अंधेरा है, बाहर ज़्यादा रोशनी है, तो मैंने सोचा बाहर ही खोज लिया जाए।

तो कैसा लगा हमारा झुन्नू और उसकी शानदार कहानी?

झुन्नू वो जो भीतर से बेचैन है पर भीतर अज्ञान के अन्धेरे के कारण उसे लगता है कि बाहर भाग-दौड़ करके उसकी बेचैनी मिट जाएगी। भीतर से बेचैन सिर्फ़ झुन्नू है या आप भी? ये कहानी सिर्फ़ झुन्नू की है या आपकी भी?

कहानियों से बेहतर कोई माध्यम नहीं अहम् की चोरी पकड़ने का, और वो भी तब जब उनमें हास्य भी शामिल हो। आचार्य जी द्वारा सत्रों में सुनाई गई ऐसी ही हास्य से भरी और बोधपूर्ण कहानियों का‌ पात्र है झुन्नू जिन्हें इस पुस्तक में संकलित किया गया है। आशा है कि यह पुस्तक आपके लिए समझ और बोध के रास्ते को और अधिक हल्का और रोचक बना देगी।
Select Format
Share this book
क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है? आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
Reader Reviews
5/5
8 Ratings & 2 Reviews
5 stars 100%
4 stars 0%
3 stars 0%
2 stars 0%
1 stars 0%