
दुर्गासप्तशती की भूमिका ठीक भगवतगीता के पृष्ठिभूमि जैसे ही है भगवतगीता में जहां अर्जुन घोर विषाद,संशय,निराशा,दुख से घिरे हुए स्थिति में पाए जाते है अदम्य योग्यता होते हुए भी, लगभग यही परिस्थिति मार्कण्डेय ऋषि के दुर्गा सप्तशती में भी राजा सुरथ और वणिक समाधि की होती है जिसे ऋषि द्वारा कृष्ण के भांति समझाया जाता है। कोई भी पुस्तक क्यों पढ़ा ही जाए जब वो हमारे दुख को ना काट रही हो, दुर्गासप्तशती मे ...