
भावनाएँ पढ़ते समय मुझे यह समझ आया कि हम अपनी भावनाओं को जितना महत्वपूर्ण मानते हैं, उतना ही कम उन्हें समझते हैं। यह किताब बहुत स्पष्ट तरीके से बताती है कि भावनाएँ कहाँ से आती हैं और कैसे हमारे निर्णयों को प्रभावित करती हैं। आचार्य प्रशांत ने समझाया है कि हमारी भावनाएँ अक्सर हमारे विचारों और धारणाओं का ही परिणाम होती हैं। पढ़ते समय कई बार ऐसा लगा कि मैं अपनी ही भावनाओं को एक नए नजरिए से देख रहा हूँ...

प्रथम अध्याय से:- विचार:~~ मन का हिलना-डुलना को ही विचार कहते हैं, ये हमेशा दो स्रोतों से होता है, पहला, इन्द्रियों के माध्यम से, आँखों से कुछ दिखाई पड़ा, कानों ने कुछ सुना, हाथों ने कुछ छुआ; दूसरा, मन के अपने ही माध्यम से और स्मृतियों से। इन्द्रियाँ बाहर से नहीं आतीं, इन्द्रियाँ तो दरवाज़े हैं जिनसे मन बाहर प्रवेश करता है, बाहर से ये सब आता है, ये स्टिमुलस (उत्प्रेरक) हो गया। और भीतर क्या बैठा ह...