
समझे नहीं तो अटके!

भावनाएँ पढ़ते समय मुझे यह समझ आया कि हम अपनी भावनाओं को जितना महत्वपूर्ण मानते हैं, उतना ही कम उन्हें समझते हैं। यह किताब बहुत स्पष्ट तरीके से बताती है कि भावनाएँ कहाँ से आती हैं और कैसे हमारे निर्णयों को प्रभावित करती हैं। आचार्य प्रशांत ने समझाया है कि हमारी भावनाएँ अक्सर हमारे विचारों और धारणाओं का ही परिणाम होती हैं। पढ़ते समय कई बार ऐसा लगा कि मैं अपनी ही भावनाओं को एक नए नजरिए से देख रहा हूँ...