
मैं जन्म से ही ढरौ, अंधविश्वासों के बीच पला बढ़ा हूं। जो मैंने देखा उसी को सच मानकर बिना सवाल किए जी रहा था। जब इस किताब से मेरा मुलाकात हुआ तब पता चला कि मैंने अब तक जो कुछ मानते हुए जी रहा था। वह सब झूठ था। पूरानी परंपराओं, मान्यताओं का आडंबर मात्र है। इस किताब को पढ़कर बहुत कुछ समझ में आया।