अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 12) (Ashtavakra Gita Bhashya, Prakran 12) [New Release]

अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 12) (Ashtavakra Gita Bhashya, Prakran 12) [New Release]

मुनि अष्टावक्र और राजा जनक संवाद
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Paperback Details
Hindi Language
154 Print Length
Description
अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक विलक्षण ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की चरम संभावना को प्रकट करता है। पिछले प्रकरणों में ऋषि अष्टावक्र द्वारा दिए ज्ञान के परिणामस्वरूप राजा जनक को मिली स्पष्टता व दृष्टि का वर्णन है।

इन श्लोकों में राजा जनक बताते हैं कि कैसे क्रमशः शरीर के कर्मों, वाणी की व्यस्तता और मन की चिंताओं से उनकी पहचान ढीली पड़ती जा रही है, और अंततः वे अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं। अब उन्हें न मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करना है, न किसी अनुभव को पकड़ना है, न किसी दुख से बचना है, क्योंकि वे अपनी वास्तविकता से परिचित हैं। जो खोजा जा रहा था, वो खोया हुआ नहीं था, ऐसा जानकर अब उनकी खोज समाप्त होती है और सहज स्थितप्रज्ञता प्रकट होती है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन गूढ़ श्लोकों की व्याख्या समकालीन जीवन के संदर्भ में करते हैं। उनकी सरल और स्पष्ट व्याख्या आपको यह देखने में सहायता करती है कि मुक्ति कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है; वह केवल उस भ्रम के समाप्त होने का नाम है जिसमें हम स्वयं को कर्ता, भोगता और खोजी मानते रहते हैं।

यह पुस्तक पाठक को किसी नई उपलब्धि का वादा नहीं करती; यह उसे स्वयं के अनावश्यक संघर्षों को पहचानने और छोड़ने की दृष्टि देती है। और जब यह दृष्टि स्पष्ट होती है, तब जीवन के ये संघर्ष और भटकाव समाप्त होने लगते हैं, और व्यक्ति सहजता व स्पष्टता में स्थित होने लगता है।
Index
CH1
खोजकर नहीं, खोकर पाना
CH2
बाहरी खोज की व्यर्थता और विक्षेप से मुक्ति
CH3
जड़ता का नियम और प्रेम का प्रयास
CH4
त्याग-ग्रहण, हर्ष-विषाद से परे
CH5
दोषों का उपचार नहीं, ज्ञान ही समाधान
CH6
कर्म, त्याग और अज्ञान का संबंध
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