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Paperback Details
HindiLanguage
200Print Length
Description
अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत के शिखर-ग्रंथों में एक है, जिसमें मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के बीच हुए गहन संवाद का वर्णन है। यहाँ ज़ोर किसी विधि, मंत्र या अभ्यास पर नहीं, बल्कि बोध व आत्मज्ञान की अनिवार्यता पर है।
प्रस्तुत पुस्तक अष्टावक्र गीता के प्रकरण 10 पर आधारित आचार्य प्रशांत द्वारा की गई वेदान्तिक व्याख्या है। वे अष्टावक्र गीता शृंखला के इस चौथे भाग में आपको संसार-त्याग की सलाह नहीं देते, संसार-रचना की जड़ दिखाते हैं: कामना। जहाँ कामना है, वहीं संसार का चक्र है; और मुक्ति कोई नई उपलब्धि नहीं, वह बस कामना के क्षय का नाम है।
प्रकरण के आठ श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि परंपरा में धर्म, अर्थ, काम को ‘पुरुषार्थ’ कहा गया, पर जब ये तीनों अहंकार को राहत देने की दिशा में चलें, तो आध्यात्मिक परिणति नहीं दे सकते। इसीलिए ऋषि का वाक्य कठोर है: काम (इच्छा), अर्थ (वह ‘अर्थ’ जो असल में स्वार्थ बन चुका है), और ऐसा धर्म जो इन दोनों का कारण बनता है — इन सबका अनादर करो; इन्हें छोड़ो। यहाँ ‘वैराग्य’ का अर्थ किसी नैतिक महानता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि तथ्यों का निर्भय स्वीकार है, जो कि इन्हीं क्षणभंगुर विषयों की अनित्यता को जानने से होता है।
यह पुस्तक आपको ‘और कुछ’ नहीं देती, बल्कि कर्मकांडों, मान्यताओं, और जो कुछ अतिरिक्त है, उसे आपसे दूर करती है। वैराग्य को भाव या दमन की तरह नहीं, बोध के रूप में आप तक लाती है, जिससे आपके भ्रम कम होते हैं, पकड़ ढीली पड़ती है, और बंधन अपनी ताकत खो देते हैं।
Index
CH1
पुरुषार्थ: सकाम धर्म से निष्काम धर्म तक
CH2
त्याग नहीं, अनित्यता का ज्ञान
CH3
प्रेम और निष्कामता: जहाँ उम्मीद नहीं, वहीं शांति है