ख़ास पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का कॉम्बो भारी छूट पर! अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (1-2) + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (3-6) + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (7-9) + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और अपने जीवन को सही दिशा दें।
अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (1-2):
अद्वैत वेदांत के उच्चतम ग्रंथों में है अष्टावक्र गीता। इसमें अद्वैत ज्ञान का निरूपण भी है, मुक्ति के चरणबद्ध उपाय भी हैं और एक ब्रह्मज्ञानी की बात भी है।
राजा जनक एक काबिल शासक हैं। जो सभी प्रकार से सम्पन्न और प्रसन्न हैं; पर फिर भी एक आंतरिक अपूर्णता सताती है। इसलिए समाधान के लिए ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं, जिनकी उम्र मात्र ग्यारह वर्ष है।
राजा जनक का प्रश्न होता है — वैराग्य कैसे हो? मुक्ति कैसे मिले?
चूँकि ग्रंथ की शुरुआत ही तात्विक जिज्ञासा से होती है इसलिए अष्टावक्र की बात श्लोक दर श्लोक बहुत गहराई तक जाती है। अष्टावक्र का प्रत्येक श्लोक इतना सशक्त और सटीक होता है कि प्रथम अध्याय के अंत में ही राजा जनक मुक्त हो जाते हैं। इस पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने प्रथम दो प्रकरण के प्रत्येक श्लोक की सरल व उपयोगी व्याख्या प्रस्तुत किया है।
प्रथम प्रकरण की विषयवस्तु
शिष्य एक संसारी है। इसलिए बात की शुरुआत होती है आचरण के तल से। फिर इसके पश्चात बात खुलती है आत्मज्ञान की।
अष्टावक्र आसक्ति को बंधन व निरपेक्ष दर्शन को मुक्ति का रहस्य बताते हैं।
द्वितीय प्रकरण की विषयवस्तु
राजा जनक अब मुक्त हो चुके हैं। प्रकरण की शुरुआत ही उनकी उद्घोषणा से होती है; "अहो! मुक्ति इतनी सहज थी, मैं अब तक समझ क्यों न सका?" राजा जनक स्वयं को बोध स्वरूप जानने लगे और स्वयं के शरीर और मन ऐसे देखने लगे जैसे वो कोई स्वतंत्र इकाई हों।
अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (3-6):
आध्यात्मिक ग्रंथों में अष्टावक्र गीता का स्थान अद्वितीय है। इस अनुपम ग्रंथ को अद्वैत वेदान्त का सबसे शुद्ध ग्रंथ कहा जाता है। यह ग्रंथ मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के मध्य हुए आत्मज्ञान विषयक संवाद का संकलन है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत द्वारा प्रकरण तीन से छः के श्लोकों पर दिए विस्तृत और सरल व्याख्यानों को संकलित किया गया है।
पुस्तक में तीसरे प्रकरण में अहम् और जगत का सम्बन्ध बताने से हुई शुरुआत छठे प्रकरण तक आत्मा और जगत के सम्बन्ध की गहराई तक ले जाती है।
तीसरे प्रकरण में ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि जिस जगत ने तुमको गंदा किया, उसी जगत में तुम्हें सफ़ाई नहीं मिलने वाली। और छठे प्रकरण में ऋषि कहते हैं, "मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण, बस इसके साथ एकरूप होना है।"
इस अति शुद्ध ग्रंथ पर आचार्य प्रशांत की व्याख्या ने इसे सब मुमुक्षुओं के लिए सरल और ग्राह्य बना दिया है।
अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (7-9):
अष्टावक्र गीता वेदान्त का कालजयी ग्रंथ है, जिसमें मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के बीच हुए गहन संवाद का वर्णन है। राजा जनक, जिन्हें बाहरी सुख-सुविधाओं से संपन्न होने के बावजूद एक अपूर्णता सताती है, ज्ञान और मुक्ति की मंशा से ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं। ग्रंथ की शुरुआत ही ज्ञान और मुक्ति की चाह के साथ होती है।
इस भाग में बात सातवें अध्याय तक पहुँच गई है, और गहरी हो गई है। ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को उनके बंधन पहचानने के लिए स्पष्टता दे रहे हैं। आज इस ग्रंथ की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि मानवजाति के पास अनेक संसाधन और सूचना का भंडार उपलब्ध है। मनुष्य की गहरी इच्छा मुक्ति की ही है, इसलिए यह जानना अधिक आवश्यक हो जाता है कि क्या मुक्तिदायी है और क्या नया बंधन।
प्रस्तुत पुस्तक आचार्य प्रशांत द्वारा प्रकरण 7 से 9 पर दिए गए विस्तृत और सरल व्याख्यानों का संकलन है। प्रकरण 7 में राजा जनक घोषणा करते हैं कि वे मन और जगत के इस खेल से पूरी तरह अप्रभावित हैं, और ऋषि अष्टावक्र एक सच्चे गुरु की तरह उन्हें बंधन और उसकी निशानियों से अवगत कराते हुए सतर्क करते हैं।
अष्टावक्र गीता पर आचार्य प्रशांत की यह सरल, स्पष्ट और सटीक व्याख्या एक सेतु के समान है, जिसके माध्यम से आप इस गहन चर्चा को आसानी से समझ सकते हैं।