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Paperback Details
HindiLanguage
70Print Length
Description
हमारा जन्म एक परिवेश, एक परंपरा, एक धर्म और लोकसत्यों से भरे समाज के बीच होता है, जहाँ से हमें हमारी प्राथमिक पहचान, हमारा नाम मिलता है। हमारी सोच, पसंद, महत्वाकांक्षाएँ और निर्णय, जिसे हम अपनी स्व-चयनित पहचान कहते हैं, वह भी इन्हीं प्रभावों से जन्मती और सुदृढ़ होती है।
अब एक पल ठहरकर खुद से पूछिए: इन सब प्रभावों को हटा दें, तो बचता क्या है जो सचमुच आपका अपना है?
बाबा बुल्लेशाह के काव्य “अब हम गुम हुए” की व्याख्या में आचार्य प्रशांत इसी मूल प्रश्न को पाठक के सामने रखते हैं।
जीवन में जिन मान्यताओं को हमने अपनी पहचान का नाम दे दिया है, वह वास्तव में अहंकार का नकली ढाँचा है। ‘गुम होना’ कोई खो जाना नहीं है, बल्कि अहंकार के उस ढाँचे का गलना है जिसमें सब उधार की मान्यताएँ, भ्रम और झूठे विश्वास मिटने लगते हैं। इस विगलन को ही संत ‘खुदी के खोने’ से परिभाषित करते हैं, जहाँ से अपना वास्तविक ‘आप’ पहचानने की संभावना खुलती है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत वेदांत, गीता और संतवाणी की स्पष्टता के साथ पाठक को ‘गुम होने’ की वास्तविक मौज से अवगत कराते हैं और अपनी उधार की पहचानों के पीछे के तथ्य को जाँचने के लिए आमंत्रित करते हैं।